अहसास
कुछ अजीब सा रिश्ता है मेरा तुम्हारा
जब हम मिले
तुम अपने आज में
बीते कल को ढूंढ रही थी
और मैं अपने आज में अपने
आने वाले कल को ढूंढ रहा था,
तुम्हारे बीते कल के
धागों ने फिर तुम्हे बांध लिया
और तुमने मेरे साथ बुने
आने वाले कल के धागे को झटक दिया
न मैं निराश नही हूँ
बस सोचता हूँ कि
कंही फिर कभी
तुम्हारे किसी बीते हुए कल के
धागों ने धोखा दिया
तो फिर इन धागों को हाथ मे लिए
तुम्हे जोड़ने के लिए क्या मैं खड़ा रहूँगा?
न कोई उम्मीद न कोई तजवीज
बस एक ख्वाब है
और ख्वाब के सहारे दुनिया जीती है
मै भी एक ख्वाब के सहारे चल पड़ा हूँ
बना हक्कीकत तो हूँगा शुक्रगुजार उनका
वरना अफसाना हूँ कंही अहसास बनकर पड़ा रहूंगा।
प्रवीन झांझी