तुम क्यो मुझसे मुझे
छीनना चाहते हो
मैं तो पूरा ही तुम्हारा था
तुमने मुझे मुझको वापिस दिया
अब फिर क्यो मुझे मुझसे
वापिस छीनना चाहते हो।
जबकि न तुम मुझे ठीक से अपना सके
न कभी ठीक से ठुकरा सके
जब चाहा बुला लिया
जब चाहा ठुकरा दिया
यह तो कोई जिंदगी का सलीका न हुआ
या तो हमसफर बन जाओ
या फिर बेवफा कहलाओ
जब बनोगे हमसफ़र
तो वफ़ा भी आ जायेगी
जब चलोगे साथ चन्द कदम
तो राहे भी खुद खुल जाएंगी
जब खुलेंगी राहे तो
मंजिल भी नजर आएंगी
यह मंजिल की चाह ही तो है
जो जिंदगी खुद ब खुद चली जायेगी
और हर सांस जीने का
सलीका बन जाएगी।
प्रवीन झांझी।