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राजीव गांधी सरकार शुरू से ही विवादों के घेरे में घिरी रही। 2 और 3 दिसंबर की रात 1984 में भोपाल में एक गैस त्रासदी हुई। यूनियन कार्बाइड के प्लांट में आधी रात के करीब एक कीटाणु नाशक दवाई 'मिक' का रिसाव हुआ। सारा भोपाल अपने अपने घर में सर्दी के इस मौसम में आराम से सो रहा था। अचानक ही लोगों को का दम घुटने लगा उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी, उल्टियां होने लगी। मगर किसी को पता नहीं चला यह क्यों हो रहा है। लोग सांस लेने के लिए सड़कों पर आ गए। मगर सड़कों पर भी रसायनिक धुआं फैला हुआ था। हर कोई इधर-उधर जान बचाने के लिए भागने लगा। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। लोग हॉस्पिटलों की तरफ भागेl मगर डॉक्टरों को भी पता नहीं था कि यह कैसे ठीक होगा या इससे कैसे बचाया जाये। पूरा भोपाल बेचैन था। फिर आहिस्ता आहिस्ता खबर आई कि यूनियन कार्बाइड से कीटाणु नाशक रसायन का लीकेज हुआ है। मगर तब तक हजारों लोग मौत के मुंह में जा चुके थे और हजारों ही उस रसायन के प्रभाव में तड़प रहे थे। आहिस्ता आहिस्ता जब उस रसायन का प्रभाव कम होना शुरू हुआ तब प्रशासन ने स्थिति को संभालना शुरू किया और नुकसान का जायजा लिया गया। हालांकि सरकारी आंकड़ों में कुल मौत की संख्या 3787 की बताई गई थीl मगर निजी सूत्रों का यह दावा था की मौत की संख्या 15000 थीl और प्रभावित लोगों की संख्या 5,00,000 से ऊपर थी। इतना ही नहीं इस दुर्घटना का प्रभाव उन परिवारों पर कई जनरेशन तक रहेगा।
आरोप लगे कि टैंक संख्या ६१० में उसकी अधिकृत सीमा से ज्यादा एमआईसी गैस भरी थी तथा गैस का तापमान भी जो ४.५ डिग्री होना चाहिए उसकी जगह २० डिग्री था। पॉवर का बिल कम करने के लिए 'मिक' के कूलिंग स्तर को बनाये रखने के लिए बनाया गया फ्रीजिंग प्लांट भी बंद कर दिया गया था। इसी प्लांट मे सही तरीके से रख रखाव न होने की वजह से पानी का रिसाव हो गया और तापमान 200° तक पहुँच गया और गैस लीक हो गयी l ऐसा नही था कि यह पहला हादसा था l इस दुर्घटना से पहले जनवरी 1982 मे पाइप से हुए गैस रिसाव के संपर्क में आकर कंपनी के एक कर्मचारी मोहम्मद अशरफ की मौत हो गई थी। एक महीने बाद 10 फरवरी 1982 को फैक्ट्री में एक और दुर्घटना घट गई l जिसमें 25 कर्मचारी जहरीली गैस के प्रभाव में आ गए l हालांकि, उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाकर पर्याप्त एंटीडोज दे दिया गया था l जिससे उनकी जान बच गई। कर्मचारी यूनियनों ने इसका विरोध भी किया था मगर प्रबंधको ने इस पर ध्यान नही दिया l
यूनियन कार्बाइड के सीएमडी श्री वारेन एंडरसन जब 6 दिसंबर 1984 को भोपाल पहुंचे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मगर 6 घंटे बाद ही उन्हें पच्चीस हजार के मुचलके पर जमानत दे दी गई । 7 दिसंबर 1984 को उन्हें भारत से बाहर जाने दिया गया। श्री राजीव गांधी सरकार पर उनकी मदद करने का आरोप लगता रहा है। एक बार वह भारत से बाहर गए तो फिर कभी जांच के लिए भी भारत वापस नहीं आए और 2014 में उनकी मृत्यु हो गई। यह विश्व में आज तक की सबसे भीषण औद्योगिक घटना थी।
दूसरी तरफ श्री राजीव गांधी मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री बने श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह अब उनके लिए सिर दर्द बनते जा रहे थे। जब श्री राजीव गांधी ने अपना मंत्रिमंडल बनाया तब उन्होंने बड़े विश्वास से श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री लिया। मगर शीघ्र ही श्री राजीव गांधी और श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के बीच में मतभेद होने शुरू हो गए। फिर जनवरी 1987 में श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को वित्त मंत्रालय से हटाकर रक्षा मंत्रालय दे दिया गया। इस दौरान भाजपा, वामपंथी और अन्य विपक्षी पार्टियों ने यह वातावरण बनाना शुरू कर दिया कि श्री राजीव गांधी की सरकार भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है। श्री राजीव गांधी जो कि श्री संजय गांधी की मृत्यु के बाद ही राजनीति में आए थे वह अभी राजनीति में परिपक्व नहीं थे। उनकी इसी कमजोरी का फायदा उठाते हुए विपक्षियों ने श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को एक नायक की तरह प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। भाजपा को यह पता था उत्तर भारत और मध्य भारत को छोड़कर उनका प्रभाव देश मे न के बराबर है।वामपंथियों का प्रभाव भी पूर्वी भारत के कुछ क्षेत्रों तथा दक्षिण भारत के 1या 2 राज्यों को छोड़कर कहीं नहीं था। अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के लिए उन्होंने फौरी तौर पर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को लाइसेंस राज खत्म करने, गोल्ड आयात टैक्स घटाने तथा टैक्स चोरी रोकने के लिए महिमामंडित करने का काम शुरू कर दिया। उसमें श्री राजीव गांधी के कजन ब्रदर श्री अरुण नेहरू ने भी श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का साथ दिया। नतीजा यह हुआ की श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह और श्री राजीव गांधी के बीच मतभेद बढ़ते चले गए। जब श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को रक्षा मंत्री बनाया गया तब तक यह मतभेद चरम सीमा पर पहुंच गए थे। श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के रक्षा मंत्री बनते ही यह चर्चा फैल गई कि श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को बोफोर्स बंदूक के सौदे में दलाली के कुछ सबूत मिले हैं। हालांकि अधिकारिक रुप से श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इसकी कोई पुष्टि नहीं की थीl मगर जनमानस के मन पर यह बात बैठ चुकी थी कि 1986 में भारत और स्वीडन के बीच जो वो बोफर्स बंदूक खरीदने का समझौता हुआ है उसमें घोटाला हुआ है। रक्षा मंत्री के पद से 12 अप्रैल 1987 को श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस्तीफा दे दिया। 16 अप्रैल 1987 को स्वीडन रेडियो पर बोफोर्स सौदे में दलाली की खबर चली। सितंबर 1987 मे भारत सरकार ने बोफोर्स कंपनी को ब्लैक लिस्ट कर दिया। हिंदू अखबार ने इस घोटाले पर काफी कुछ छापा। श्री राजीव गांधी सरकार की छवि को इससे काफी नुकसान पहुंचा।
बोफोर्स के अलावा एचडब्ल्यू पनडुब्बी घोटाले की गूंज भी देश में फैली हुई थी।
इतना ही नहीं तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के भी श्री राजीव गांधी के साथ संबंध खराब हो चुके थे। जब श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी उस समय श्री राजीव गांधी कोलकाता में थे और राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ओमान में थे। श्री राजीव गांधी को कोलकाता से और ज्ञानी जैल सिंह को ओमान से तुरंत बुलाया गया और उन्होंने आते ही श्री राजीव गांधी को प्रधानमंत्री की शपथ दिलाई। उसके बाद ही श्रीमती गांधी की मृत्यु की घोषणा की गई। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद सिख समुदाय का ज्ञानी जैल सिंह पर बहुत दबाव था कि वह राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दे दें। कहा जाता है की जब 31 अक्टूबर 1984 को जब दंगे भड़के तो उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी से फोन पर संपर्क करने की लगातार कोशिश कीl मगर श्री राजीव गांधी फोन पर नहीं आए। इससे श्री राजीव गांधी और ज्ञानी जैल सिंह के संबंधों में कटुता आ गई थी।
बाद में पंजाब से संबंधित जानकारी भी ज्ञानी जैल सिंह से सांझा नहीं की जाती थी। श्री राजीव गांधी सरकार के मंत्रिमंडल के एक सांसद श्री के के तिवारी ने यह आरोप लगाया था की ज्ञानी जैल सिंह का घर आतंकवादियों का अड्डा बना हुआ है। इसका संसद और बाहर पुरजोर विरोध हुआ। आखिर में श्री राजीव गांधी को उस सांसद के विरुद कार्यवाही करनी पड़ी। श्री राजीव गांधी का यह कहना था कि मंत्रिमंडल के हर फैसले की जानकारी राष्ट्रपति को देनी जरूरी नहीं है। वही ज्ञानी जैल सिंह का यह कहना था कि मंत्रिमंडल के हर फैसले की सूचना राष्ट्रपति को देनी आवश्यक है। इसी गतिरोध के चलते पोस्ट ऑफिस संशोधन बिल को ज्ञानी जैल सिंह ने अपने पास रोक लिया। इस पर बहुत तनाव हो गया था। एक समय पर तो यह लगता था की ज्ञानी जैल सिंह कंही श्री राजीव गांधी सरकार को बर्खास्त न कर दे। मगर कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की मध्यस्थता के कारण दोनों के बीच में राष्ट्रपति भवन में 2 घंटे से भी ज्यादा बातचीत हुई। उससे तनाव कुछ कम हुआ l अंत में इसी साल 1987 में ज्ञानी जैल सिंह का कार्यकाल समाप्त हुआ। आशंका यह भी थी कि ज्ञानी जैल सिंह संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति का चुनाव फिर से लड़ सकते हैं। मगर ऐसा नहीं हुआ और ज्ञानी जैल सिंह रिटायर हो गए।
इसी बीच जब पंजाब मे अलगावादी कई ग्रुप सक्रिय थे तब स्वर्ण मंदिर पर अलगावादियों को निकालने के लिए दो बार कार्यवाही करनी पड़ी l जिसे ओपरेशन ब्लैक थंडर 1 तथा 2 के नाम से जाना जाता है l इन मे ओपरेशन ब्लू स्टार के मुकाबले बहुत कम नुकसान हुआ था l पहला ओपरेशन 30 अप्रैल 1986 को पंजाब के डी जी पी जूलियो रैबेरो ने 300 एन एस जी कमांडो और 700 बॉर्डर सेकुरिटी फोर्स के जवानो की मदद से 8 घंटे मे खत्म कर दिया था l यह ओपरेशन पंजाब के तत्कालीन मुख्य मन्त्री और अकाली दल के प्रमुख सरदार सुरजीत सिंह बरनाला की सहमति से हुआ था l इस ओपरेशन मे एक की मृत्यु हुई थी और 2 लोग घायल हुए थे l ओपरेशन ब्लैक थंडर 2 जो कि 1988 में हुआ था वह 9 दिन तक चला था l 9 मई 1988 से लेकर 18 मई 1988 तक यह ऑपरेशन हुआ थाl ऑपरेशन ब्लू स्टार के करीब 4 साल बाद एक बार फिर अलगाववादी स्वर्ण मंदिर में पहुँच गए। ऑपरेशन ब्लैक थंडर के दौरान श्री अजीत डोभाल रिक्शा वाला बनकर स्वर्ण मंदिर के अंदर गए। उन्हे अलगावादियो को ये विश्वास दिलाने में दस दिन लग गए कि उन्हे आईएसआई ने उनकी मदद के लिए भेजा है। जब वो 2 दिन बाद स्वर्ण मंदिर से बाहर आये तो उनके पास आतंकियों के हथियारों से लेकर, उनकी योजना, लड़ाकों की छिपे होने की सटीक जानकारी उनके पास थीं। दो दिन बाद ही यह ओपरेशन शुरू किया गया I 9 मई 1988 को दोपहर 1 बजे जब CRPF के DIG सरबदीप सिंह विर्क जब स्वर्ण मंदिर के बाहर अलगावादियो द्धारा बनाई एक दीवार को गिरवा रहे थे, तभी मंदिर के अन्दर से गोलियां चलनी शुरू हुई l एक गोली विर्क को लगी और वो घायल हो गए l वो बाल बाल बचे l इसके बाद स्वर्ण मंदिर के बाहर से CRPF के जवानो और मंदिर के अन्दर से लगभग 150 अलगावादियो के बीच जबरदस्त गोलीबारी शुरू हो गयी l डीजीपी श्री के पी एस गिल को इस बार ऑपरेशन का कमांड दिया गया l दिल्ली से एनएसजी कमांडोज की टीम भेजी गयी l मगर इस बार एनएसजी कमांडोज सपोर्टिंग रोल में रखे गये l ऑपरेशन मुख्यता पुलिस का माना गया l स्वर्ण मंदिर में बलपूर्वक घुसने के प्लान के बजाय अलगावादियों को थका कर, हौसला पस्त करके सरेंडर करवाने की रणनीति बनाई गयी l स्वर्ण मंदिर के चारो ओर घेराबंदी की गई l आसपास के इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया I स्वर्ण मंदिर के चारों ओर स्थित मकानों की उंचाई पर स्नाइपर राइफल के साथ एन एस जी कमांडोज तैनात किये गये l CRPF के जवानों भी साथ थे l स्वर्ण मंदिर की बिजली सप्लाई काट दी गयी l जैसे ही कोई अलगावादी पानी लेने आता स्नाइपर उसे अपनी गोली का निशाना बना लेते l जैसे ही कोई आटे की बोरी लेने आता, उसे निशाने पर ले लिया जाता l ऐसे में भूखे, प्यासे आतंकियों का मनोबल तेजी से टूटने लगा l रह रह कर स्वर्ण मंदिर के अंदर से मशीनगन से जबरदस्त फायरिंग की जाने लगी l बाहर सुरक्षाकर्मियों की तरफ से भी जवाबी कार्यवाही की जाने लगी lभूखे, प्यासे अलगावादियों का मनोबल टूटने लगा l इस दौरान बार बार लाउडस्पीकर पर सरेंडर की अपील भी की गई l अंत में करीब 150 अलगाव वादियों ने 18 मई 1988 को सुरक्षा बलों के सामने आत्म समर्पण कर दिया l 41 अलगाव वादी इस ऑपरेशन मे मारे गये l ऑपरेशन ब्लैक थंडर की खास बात यह रही की यह मिडिया की लाइमलाइट में किया गया l
उधर श्रीलंका के तमिल का मसला उलझता जा रहा था। सन 1980 के दशक के शुरू से ही श्रीलंका में तमिल लोगों का उनकी सरकार से संघर्ष चल रहा था। उसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा था। श्री लंका सरकारों का झुकाव शुरू से ही पश्चिमी देशों की तरफ रहा था तथा वह भारत की बजाए पाकिस्तान के संपर्क में थे। भारत को आक्षका थी कि अमेरिका श्री लंका मे हस्तक्षेप कर अपने अड्डे न बना ले l 23 जुलाई 1983 को लिट्टे के लोगो ने 13 श्री लंका के सैनिक मार दिये l श्री लंका मे दङ्गे भड़क गये l लिट्टे और श्री लंका की सेना मे गृह युद्ध छिड़ गया l लाखो तमिल शरणार्थी भारत में आ गये। भारत के बार बार कहने पर भी श्रीलंका, भारत की नहीं सुन रहा था और उल्टा वह हम पर आरोप लगा रहा था कि हम तमिलों को भड़का रहे हैं। उधर भारत में रहने वाले तमिल सरकार पर दबाव बना रहे थे कि वह श्री लंका सरकार के ऊपर दबाव बनाएं l क्योंकि उनके संबंधी श्रीलंका में रह रहे थे। उधर श्री लंका में आपसी टकराव के बाद श्रीलंका के तमिल बहुल जाफना क्षेत्र की लंका सेना द्वारा घेराबंदी कर दी गई। जिसकी वजह से वहां पर जरूरी चीजों का बहुत अभाव हो गया। अब भारत सरकार को बीच में कूदना ही पड़ा। पहले समुद्री जहाज द्वारा जरूरी सहायता सामग्री भारत द्वारा भेजे जाने की कोशिश की गई। श्रीलंका की नौसेना ने उसे वापस भेज दिया।
तब 4 जून 1987 को एयरफोर्स की मदद से सेना ने जरूरी चीजें जाफना इलाके में फैंकीl अब श्रीलंका सरकार दबाव में आ गई। उन्हें लगने लगा कि कहीं भारत सीधा ही इस संघर्ष में न उतर जाए। अब भारत और श्रीलंका के बीच इस समस्या के हल के लिए बातचीत शुरू हुई l 29 जुलाई 1987 को भारत और श्रीलंका समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते के अनुसार तमिल बहुल क्षेत्र को कुछ स्वायत्ता दी गयी। लंका सेना को उत्तरी श्रीलंका से हटने तथा आंदोलनकारियों के हथियार डालने की बात की गई। उनके हथियार डलवाने के लिए भारत से इंडियन पीसकीपिंग फोर्स भेजने की बात भी कही गई, जो कि आंदोलनकारियों के हथियार लेगी। मगर भारत सरकार से गलती यह हुई कि उस वार्ता में तमिल आंदोलनकारियों को शामिल नहीं किया गया। तमिल आंदोलनकारियों को हथियार डालने में हिचकिचाहट थी। काफी तमिल आंदोलनकारियों ने हथियार डाल दिए। मगर लिट्टे के आंदोलनकारी दुविधा में थे। लंका सेना को वहां से हटाकर दक्षिण क्षेत्र में कानून व्यवस्था के लिए भेज दिया गया। मगर लिट्टे के दो कमांडरो को श्री लंका सेना ने पकड़ लिया और वो IPKF और श्री लंका सेना की सयुंक्त हिरासत मे थे l उन्हे श्री लंका सरकार के कहने पर कोलंबो भेज दिया गया l उन्होंने जहर खा कर आत्महत्या कर ली l लिट्टे और इंडियन पीसकीपिंग फोर्स के बीच टकराव शुरू हो गया l अब जो लड़ाई लंका सेना और तमिल आंदोलनकारियों की थी, वह भारतीय सेना के गले पड़ गई। भारतीय सेना के 1200 से ज्यादा सैनिक शहीद हो चुके थे l
उधर लंका सरकार भी अपने स्थानीय सिंहली लोगो के दबाव मे यह चाहने लगी कि इंडियन पीसकीपिंग फोर्स वापिस जाए l क्योंकि उस पर भी आंतरिक दबाव था। श्री राजीव गांधी इसके लिए तैयार नहीं थे। पूरे दक्षिण भारत में इससे राजीव सरकार विरोधी भावना उमड़ पड़ी (अंत मे श्री वी पी सिंह की सरकार बनने पर मार्च 1990 को भारतीय सेना को वापस बुला लिया गया) l इधर उत्तर तथा मध्य भारत में बोफोर्स कांड तथा अन्य भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों से राजीव सरकार के विरोधी लहर थी। उधर भाजपा चाहती थी कि मतों का ध्रुवीकरण हो, तभी उनका सत्ता में आना संभव हो पाएगा। उत्तर प्रदेश में जब तक वोटों का ध्रुवीकरण न होता तब तक उन्हें सत्ता में आना मुश्किल लग रहा था। श्री राजीव गांधी ने 1986 मे शाहबानो केस में सुप्रीम सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला पलट दिया थाl जिसमें उसको उसके पति से गुजारा भत्ता दिलाने का आदेश था। उसको कानून बनाकर रद्द कर दिया था। भाजपा यह आरोप लगा रहे थी कि यह मुस्लिम तुष्टीकरण है। साधारण हिंदू जनता जिसे इस फैसले के आने या न आने से कोई फर्क नहीं पड़ता था, वह भी भावनात्मक रूप से उद्वेलित हो रही थी कि यह मुस्लिम तुष्टीकरण है। हिंदू मतों की नाराजगी दूर करने के लिए श्री राजीव गांधी ने 1986 के फैजाबाद कोर्ट के फैसले के आधार पर बाबरी मस्जिद के ताले खुलवा कर वहां शिलान्यास करवा दिया। मगर कांग्रेस की यह परेशानी थी कि वह इस बात का ठीक से प्रचार नहीं कर पाई थी या करना नहीं चाहती थी। वह चाहते थे कि सिर्फ इतना ही मुद्दे को उठाया जाए जिससे हिंदू खुश हो जाए और मुस्लिम नाराज न हो। मगर ऐसा नहीं हुआ उनसे हिंदू भी नाराज हो गए और मुस्लिम भी l
मुस्लिम की नाराजगी कांग्रेस को ज्यादा महंगी पड़ी।दक्षिण भारत में जो कि कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, वहां लंका में तमिलों की स्थिति को लेकर राजीव सरकार विरोधी लहर फैल गई। श्री वी पी सिंह ने जब रक्षा मंत्री का पद छोड़ा तभी अपना सांसद का पद भी छोड़ दिया और कांग्रेस से भी त्यागपत्र दे दिया था। उन्होंने जनमोर्चा नाम की एक पार्टी बनाई। ज्यो ज्यो 1989 के चुनाव नजदीक आते गए त्यों त्यों राजीव गांधी सरकार को हराने के लिए विपक्षी एकता की बात होने लगी। आहिस्ता आहिस्ता श्री लालू प्रसाद यादव, श्री मुलायम सिंह यादव, श्री चंद्रशेखर, श्री देवी लाल आदि पूर्व जनता पार्टी के कई घटकों को मिलाकर जनता दल बनाया गया।
सन 1989 चुनाव में कांग्रेस सत्ता से दूर रह गई और किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भाजपा जानती थी कि उसकी छवि कट्टर हिंदू वादी की होने की वजह से उसे वामपंथी दलों का समर्थन नहीं मिल सकता। उधर वामपंथी जानते थे उनका नीतिगत मतभेद होने की वजह से उन्हें भाजपा समर्थन नहीं देगी और न ही वह लेना चाहेंगे। भ्रष्टाचार के मुद्दे से घिरी कांग्रेस के साथ वह खड़े नहीं दिखना चाहते थे। ऐसे में अपनी राजनीतिक मजबूरियों के चलते हैं भाजपा और वामपंथियों ने बिना सरकार में शामिल हुए जनता दल और उसकी सहयोगी छोटी पार्टियों के बने नेशनल फ्रंट को समर्थन दे दिया। अब समस्या यह थी कि श्री वी पी सिंह और श्री चंद्रशेखर में से किसे प्रधानमंत्री बनाया जाए। इस बात पर जनता दल में भी मतभेद थे। अंत में श्री देवीलाल के पक्ष में सहमति बनी मगर जब संसद के पटल पर श्री देवीलाल के प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्ताव आने लगा तो बड़े ही नाटकीय ढंग से श्री देवीलाल ने खड़े होकर श्री वी पी सिंह के नाम का प्रस्ताव रख दिया। श्री चंद्रशेखर स्तब्ध रह गए। श्री वी पी सिंह को प्रधानमंत्री तथा श्री देवी लाल को उप प्रधानमंत्री बना दिया गया। श्री चंद्रशेखर ने कोई भी पद लेने से इनकार कर दिया।
श्री वीपी सिंह की सरकार तो बन गई मगर भाजपा का अपना एक एजेंडा था की कांग्रेस को कमजोर किए बगैर उनको भविष्य अंधकारमय में नजर आता था। भाजपा ने अपना एजेंडा बढ़ाना शुरू किया और श्री राम मंदिर निर्माण का मुद्दा उठाना शुरू कर दिया। शिलान्यास तो राजीव गांधी सरकार के समय हुआ था इसलिये कांग्रेस उसका खुलकर विरोध नहीं कर पा रही थी। उधर वीपी सिंह सरकार ने आकर पहले तो आई पी के एफ को श्री लंका से वापस बुलाने की घोषणा कर दी। वैसे तो वीपी सिंह के नेतृत्व वाली नेशनल फ्रंट की सरकार शुरू से परेशानी में रही। 2 दिसंबर 1989 को सत्ता में आई और 8 दिसंबर 1989 को तत्कालीन गृह मंत्री श्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की तीसरी बेटी डॉक्टर रूबीया सईद का मुस्लिम कट्टरपंथियों ने श्रीनगर में बस से उतार कर दिनदहाड़े अपहरण कर लिया। अपहरणकर्ताओं ने एक अखबार के दफ्तर में फोन करके अपने कुछ साथियों की रिहाई के बदले डॉक्टर रुबिया सईद की रिहाई की शर्त रखी। यह सरकार के लिए बड़े शर्मनाक हालात थे। जनता दल के ही कुछ साथियों कहना था कि अगर ऐसा किया जाता है तो इससे कट्टरपंथियों के हौसले बुलंद हो जाएंगे। बहुत से मध्यस्थों के बीच में डालकर कट्टरपंथियों से बातचीत शुरू की गई। तत्कालीन जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला अपनी छुट्टी को बीच में छोड़कर लंदन से वापस आ गए। बताया जाता है कि वह कट्टरपंथियों की मांग मानने के विरुद्ध थे। मगर कानून व्यवस्था की नाकामी के नाम पर उनकी सरकार को बर्खास्त करने की धमकी दी गई। नतीजा उन पांच कट्टरपंथियों को छोड़ दिया गया तथा डॉ रूबिया सईद को कट्टरपंथियों ने रिहा कर दिया। इसमें श्री वी पी सिंह की छवि को धक्का लगा जो कि किसी गलत बात के आगे न झुकने की बात करते थे l
दूसरा झटका तब लगा जब कि चौधरी देवीलाल ने अपने बेटे श्री ओमप्रकाश चौटाला को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश शुरू कर दी। मेंहम के चुनाव में भारी हिंसा तथा गड़बड़ी के आरोप लगे। मगर चौधरी देवीलाल के दबाव में श्री ओम प्रकाश चौटाला को नहीं हटाया गया। इससेे फिर से श्री वीपी सिंह की छवि पर समझौता वादी होने का एक और दाग लगा। मई 1990 में जब श्रीओम प्रकाश चौटाला को हटा कर श्री बनारसी दास गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाया गया, तो लोगों को लगा कि शायद अब श्री वी पी सिंह कुछ करेंगे l मगर जून 1990 में श्री ओम प्रकाश चौटाला एक उप चुनाव जीत गए तो उन्हें फिर भी देवीलाल के दबाव में जुलाई 1990 में मुख्यमंत्री बना दिया गया। इसका पार्टी के अंदर ही विरोध शुरू हो गया। इस दौरान यह भी खबरें आने लगी कि चौधरी देवीलाल की नज़दीकियां पार्टी के अंदर ही श्री वीपी सिंह के मुख्य विरोधी श्री चंद्रशेखर से बढ़ती जा रही हैं। पार्टी में अंदरूनी विरोध और राजनीतिक हालात को देखते हुए चौधरी देवीलाल को मंत्रिमंडल से हटा दिया गया। जनता दल में अंदरूनी रस्साकशी पर कांग्रेस और भाजपा दोनों की कड़ी नजर थी। जहां कांग्रेस ने श्री चंद्रशेखर ग्रुप से संपर्क साधा, वहीं भाजपा ने अपने सहयोगी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा विश्व हिंदू परिषद के द्वारा गांव गांव से राम मंदिर के लिए ईटे इकठ्ठी करनी शुरू कर दी। कांग्रेस एक बार फिर श्री राजीव गांधी सरकार द्वारा शिलान्यास कराने का फायदा लेने से चूक गई और इस मामले में निष्क्रिय रही। इधर चौधरी देवीलाल ने 8 अगस्त 1990 को दिल्ली में एक बड़ी रैली आयोजित करने की घोषणा कर दीl मगर रैली से 1 दिन पहले श्री वी पी सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा कर दी। मंडल कमीशन का गठन सन 1979 में हुआ था। भारत में अन्य पिछड़ी जातियों के आर्थिक और शैक्षणिक आधार पर सर्वेक्षण के लिए बनाई गई कमेटी थी। हालांकि इसकी रिपोर्ट काफी पहले ही आ गई थी, मगर इसके लागू करने के विरोध में होने वाली प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए इसे लागू नहीं किया गया था। चौधरी देवीलाल की वजह से जाट वोट बैंक को हाथ से जाता देख श्री वी पी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का ऐलान कर दिया। शायद उनकी यह सोच थी कि भारत की जनता का तकरीबन 30% हिस्सा इन जातियों से आता है। मगर हड़बड़ी में की गई इस घोषणा से पहले इसका विस्तृत विवरण तक भी जारी नहीं किया गया। जिन लोगो को इससे फायदा होना था उनको भी इसका पता नही था l इस घोषणा को विरोधी दलों ने तुरंत लपक लिया। देश भर में इसके विरोध और समर्थन में तूफान खड़ा हो गया। भाजपा और कांग्रेस के युवा मोर्चा उच्च जातियों के विद्यार्थियों को लेकर आंदोलन पर उतर आए l सितंबर के माह में देशबंधु कॉलेज के छात्र श्री राजीव गोस्वामी ने मंडल कमीशन लागू करने के विरोध में आत्मदाह कर लिया। उससे पूरे उत्तर भारत में विरोध और उग्र हो गया
उधर भाजपा श्रीराम जन्मभूमि के मुद्दे को हिंदुओं के लिए एक बड़ा मुद्दा बनाना चाहती थी। उसके सहयोगी संगठन इस मुद्दे को गांव गांव में लोगों तक पहुंचा रहे थे। भाजपा चाहती थी कि श्री वी पी सिंह की सरकार चलती रहे और इस बीच वो श्रीराम जन्म भूमि मुद्दे को जनमानस से जोड़ दें। मगर मंडल कमीशन लागू होने से भाजपा को लगने लगा कि श्रीराम जन्मभूमि का मुद्दा पीछे हो जाएगा तथा आर्थिक कारणों से मंडल कमीशन का मुद्दा प्रधान हो जाएगा। इसी वजह से एक तरफ तो उसके युवा संगठन तथा विद्यार्थी संगठन मंडल विरोधी प्रदर्शनों में जोश शोर से भाग ले रहे थे, वंही दूसरी तरफ से श्री लालकृष्ण आडवाणी जो भाजपा के दूसरे नंबर के नेता थे उन्होंने 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ मंदिर, गुजरात से श्रीराम मन्दिर निर्माण के लिए रथ यात्रा शुरू कर दी। रथ यात्रा के 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या पहुंचकर शिलान्यास करने की घोषणा कर दी। एक बस पर रथ बनाया गया और उससे श्री लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा शुरू हुई। श्री प्रमोद महाजन उनके सहयोगी के रुप में उस में भाग ले रहे थे।
वंही वामपंथी पार्टियों को सोवियत रूस में हो रहे गतिविधियों से काफी परेशानी उठानी पड़ रही थी। अब तक वामपंथी पार्टियां सोवियत रूस के कामगारों का स्वर्ग बता कर दिखाती थी। मगर अब रूस में जिस तरह के सुधारों का वातावरण चल रहा था, वह रूस की अंदरूनी हालात की निराशाजनक तस्वीर दिखा रहा था। उधर चीन के थियानमेन सकेयर में हजारों छात्रों को चीनी सेना द्वारा टैंको से कुचले जाने और हत्याओं को लेकर पूरे विश्व में निंदा हो रही थी। वामपंथियों के सामने यह प्रश्न था कि अब उन्हें अपने बल पर बिना रूस या चीन की बात किए अपने से जुड़े लोगों को यह बताना था कि वह भारत में किस तरह की सरकार चाहते हैं। वह जानते थे कि भाजपा राम जन्मभूमि के मुद्दे पर जनमानस को उद्वेलित कर रही है। इसलिए वामपंथियों ने मंडल के समर्थन का फैसला किया। हालाँकि सिद्धांतिक तौर पर कम्यूनिस्ट धर्म, जात पात को नही मानते और बस शोषक और शोषित दो हिस्सों मे समाज को बांटते है l मगर ततकालीन राजनीतिक मजबूरियों की वजह से वामपंथी खुलकर मंडल कमीशन के समर्थन और राम जन्मभूमि के आंदोलन के विरुद्ध आ गए। इस बीच श्री लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा शुरू हो गई। वह देश के विभिन्न शहरों और गांवों से निकलने लगी। इस यात्रा से इस मुद्दे पर लोगों का ध्यान आकर्षित होना शुरू हो गया। श्री लालू प्रसाद यादव यह पहले ही सुनिश्चित कर चुके थे कि बिहार में यादवो को अन्य पिछड़ी जातियों में शामिल किया जाएगा। उधर श्री वी पी सिंह को यह उम्मीद थी कि मण्डल कमीशन के बल पर वो पिछड़े वोट ले जाएगी। मगर वो गलती यह कर रहे थे कि बिना पिछड़ी जातियों का विवरण दिए वो उनके वोटो को लेने की उम्मीद कर रहे थे। जबकि ज्यादातर लोगों को यह मालूम ही नही था कि वो पिछड़ी जाति में आते है।
भाजपा हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की उम्मीद लगाए बैठी थी l कांग्रेस सोच रही थी कि अपने अंतर्विरोधो से यह सरकार गिर जाए फिर देखेंगे क्या करना है। इन सबके चलते श्री वी पी सिंह के इशारे पर श्री लालू प्रसाद यादव ने श्री लालकृष्ण आडवाणी को बिहार में घुसते ही समस्तीपुर में 23 अक्टूबर को गिरफ्तार कर लिया। 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवकों ने अयोध्या में आंदोलन किया और गोली चली जिससे कई कारसेवक मारे गए। फिर दो अक्टूबर 1990 को कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद की तरफ बढ़ने की कोशिश की। फिर गोली चली और फिर कई कारसेवक मारे गए। भाजपा ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया। श्री वी पी सिंह ने त्याग पत्र देने की बजाय विश्वासमत के लिए संसद का सत्र बुलाने की घोषणा की। सारा दिन संसद का सत्र चलताा रहा ।आरोप प्रत्यारोप लगे । श्री वी पी सिंह ने जवाब देते हुए अपने आप को पिछड़ी जातियों का मसीहा दिखाने कोशिश की। वह दिखाना चाह रहे थे कि उन्होंने अपने आदर्श के लिए अपनी कुर्सी की परवाह नहीं की। मगर श्री ओम प्रकाश चौटाला को मुख्यमंत्री बनाना आदि ऐसे निर्णय थे जिसकी वजह से उनकी यह छवि कि वह आदर्शों पर चलते हैं, वह छवि धूमिल हो चुकी थी। मगर यह जरूर था कि उन पर कोई आर्थिक आरोप नहीं लगे थे। सदन में वोटों की गिनती के बाद घोषणा हुई कि श्री वीपी सिंह की सरकार विश्वास मत हार चुकी है और इस तरह एक अध्याय इतिहास का खत्म हुआ। तभी अपूर्व के फोन की घंटी बज गई और वह यादों के घेरे से निकलकर फिर यथार्थ में आ गया।
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आज अपूर्व को ऑफिस में बैठे-बैठे निशा की बहुत याद आ रही थी। कई बार हाथ बढ़ा कि फोन कर लूं मगर फिर पीछे हट जाता आखिर क्या बात करूं और किस रिश्ते से करू। एक अजीब सी हिचकिचाहट, एक असमंजस की स्थिति थी l जहां समझ नहीं आता की क्यों करूं और कैसे करूं? उसे तर्कसंगत कैसे बनाऊ। अपूर्व जब भी निशा की आंखों में देखता तो उसे कई सवाल तैरते नजर आते। उन प्रश्न चिन्हों के पीछे कई सपने अधूरे दिखते। यह जानते हुए भी कि सारे सपने कभी सच नहीं होते मगर एक उम्मीद की शायद कुछ तो सच्चे हो जाए यह चाह हमेशा रहती है। अपूर्व ने एक झटके से फोन उठा लिया और निशा को फोन लगा दिया। जैसे ही फोन पर निशा ने हेलो कहा तो उसकी तंद्रा टूटी। "निशा कैसी हो" अपूर्व ने कहा। "ठीक हूं सर" निशा ने कहा। "शाम को क्या हम मिल सकते हैं " अपूर्व बोला। मगर फिर घबरा गया। अगर निशा ने पूछ लिया "क्यों" तो क्या जवाब दूंगा। काफी देर तक फोन पर निस्तब्धता रही फिर निशा ने कहा "कहां और कितने बजे सर"। कई बार इंसान चाहता है कि काश कभी ऐसा हो, मगर जब हो जाता है तो उसे लगता है कि यह कैसे हो गया। वही हाल शायद निशा का था। वह चाहती थी कि अपूर्व से बिना किसी काम के मिला जाए। उसका निमंत्रण आज पहली बार आया जब बिना कोई कारण बताए अपूर्व ने उसे बुलाया था। "शिवाजी स्टेडियम के पास जो क्लॉक टावर में रेस्टोरेंट है वहां मिलते हैं शाम 6:00 बजे" अपूर्व बोला। "ठीक है सर" निशा ने कहा।
शाम 6:00 बजे दोनों निश्चित समय पर पहुंच गए। औपचारिक हाल चाल पूछने के बाद दोनों सबसे ऊपर वाले फ्लोर पर जाकर बैठ गए। वर्ष अंत होने वाला था शाम ठंडी थी। वैसे भी क्योंकि यह रेस्टोरेंट कनॉट प्लेस में व्यवसायिक केंद्र के पास था तो सर्दी में दिन में भीड़भाड़ रहती थी और शाम होते होते वहां भीड़ कम हो जाती थी। बिना किसी वजह से जब मिलो तो बातचीत शुरू करना अपने आप में सबसे बड़ी चुनौती होती है। कुछ देर तो वह चुपचाप बैठे रहे। बैरा पानी दे गया, अपूर्व ने उसे दो कॉफी और सैंडविच का आर्डर भी दे दिया। मगर अब अपूर्व बोला "कैसी चल रही जिंदगी"। निशा ने कहा "बस चल रही है सर"। अपूर्व बोला "मैं कभी-कभी सोचता हूं कि ऐसे ही हम कब तक सिर्फ चलने देंगे। हम सब बस चले जा रहे हैं जिंदगी की सड़क पर और साथ में कुछ हमसफर हैं। जिनके बारे में हम समझते हैं कि वह अपने हैं। हम सब ने एक दूसरे को एक घेरे में इतना घेर रखा है कि हम एक दूसरे से दूर जाने की कल्पना नही कर सकते।" निशा ने जवाब दिया "मगर यह सुरक्षा की भावना भी तो जरूरी है सर"। अपूर्व बोला "हालात ने एक को हाथ पकड़ कर तो हमारा बना दिया मगर दूसरा हाथ प्रकृति ने अभी भी खाली रखा। इसलिए कि कुछ भी प्रकृति में पूर्ण नहीं होता। एक तरफ के हमसफर में अगर कोई अपूर्णता हो तो वह दूसरे हाथ वाले से उसे पूर्ण कर लो। " निशा बोली "मगर सर उस दूसरे हाथ वाले हमसफर के रिश्ते को क्या नाम दें"। अपूर्व बोला "यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि किस उम्र में और किन कारणों से व्यक्ति को कौन सी अपूर्णता को पूरा करने के लिए दूसरे हाथ में किसी हमसफर की जरूरत पड़ती है।" दोनों ने एक दूसरे की तरफ बड़ी गहरी नजर से देखा और फिर अपने अंदर की अपूर्णता पर विचार किया की क्या वो एक दूसरे का दूसरा हाथ पकड़ सकते हैं। मगर मध्यम वर्ग की मान्यताओ अपने संस्कारों की जकड़न की वजह से ज्यादा दूर तक नहीं सोच पा रहे थे। और फिलहाल उन्होंने आगे बातचीत को इस विषय से मोड़ दिया। तब तक बैरा काफी लगा गया था और उन्होंने अन्य विषयों पर बात करनी शुरू कर दी। बिल देेेकर बात करते हुए वो नीचे उतर आए। ऑटो पकड़ कर अपने अपने घर की तरफ चल दिए।
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रास्ते में अपूर्व के विचारों की श्रंखला एक बार फिर राजनीति की तरफ मुड़ गई गई। वो सोचने लगा की किस तरह से श्री चंद्रशेखर ने पिछले अनुभवों से कुछ नहीं सीखा था और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री का पद संभाला था। कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाने से पहले वह भूल गए की उनसे पहले श्री मोरारजी देसाई की सरकार को गिराने के लिए श्री चरण सिंह को भी इसी तरह समर्थन दिया गया था और कुछ ही महीने में समर्थन वापस ले लिया और श्री चरण सिंह की सरकार गिर गई थी। मगर शायद उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा ने उनको कुछ सोचने नहीं दिया। हालांकि भाजपा, श्री वीपी सिंह और वामपंथी यह चाहते थे कि तुरंत चुनाव हो जाए। ऐसे में भाजपा श्रीराम मंदिर के मुद्दे पर और वीपी सिंह मंडल कमीशन के मुद्दे पर हीरो बनने की कोशिश कर रहे थे। मगर उधर कांग्रेस के पास कोई मुद्दा नहीं था और वह चाहते थे कि देश का विश्वास इन गठबंधन सरकारों से हटा दें। लोगों के दिमाग में यह भर दो कि गठबंधन की सरकार मजबूत नहीं होती। अतः उन्होंने चंद्रशेखर को समय बिताने के लिए समर्थन दे दिया। देश की आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही थी। विदेशी मुद्रा का कोष धीरे-धीरे खाली होता जा रहा था। राजनीतिक उथल-पुथल अपनी चरम सीमा पर थी। राजनीतिक गर्मी भी बढ़ गई थी। श्री चंद्रशेखर सरकार से कांग्रेस ने 5 मार्च 1991 को समर्थन वापस ले लिया।
यह तो पहले ही अंदेशा था l कांग्रेस ने सिर्फ चुनाव की तैयारी के लिए समय लेने के लिए ही इस सरकार को खड़ा किया था। सांझा प्रोग्राम तय करने के लिए जो कमेटी बनाई गई थी उसकी सिर्फ एक ही बार मीटिंग हुई थी। उसके बाद कोई मीटिंग ही नहीं हुई। कांग्रेस यह जानती थी उसने इस सरकार को ज्यादा चलाना नहीं है। वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का दबाव बढ़ता ही जा रहा था कि भारत को अपनी आर्थिक सीमा विश्व के लिए खोल देनी चाहिए तथा उदारीकरण को अपनाना चाहिए। किसी भी वित्तीय मदद या जिनके लिए यह उनकी पूर्व शर्त थी। श्री चंद्रशेखर पुराने कांग्रेसी थे जिन्होंने आपातकाल के विरोध में कांग्रेस छोड़ी थी। उनको आपातकाल के दौरान गिरफ्तार भी कर लिया गया था। उस समय इनको यंगटर्क के नाम से जाना जाता था। बाद में जब जनता पार्टी बनी तो उसके अध्यक्ष भी बने। श्री राजीव गांधी यह जानते थे कि इनके कांग्रेस में तथा जनता पार्टी और जनता दल में काफी लोगों से संबंध है l यही नहीं श्री चन्द्रशेखर सरकार ने भाजपा से राम मंदिर अनदोलन और पंजाब में पंजाब आंदोलन पर बातचीत शुरू कर दी थी। कांग्रेस को यह डर लग गया कि श्री चंद्रशेखर अपनी जमीन मजबूत न कर ले। इसी दौरान जब सरकार बजट की तैयारी में लगी थी, तभी एक घटना हुई। हरियाणा पुलिस के दो सिपाही श्री राजीव गांधी के घर के बाहर घूमते हुए पाए गए। कांग्रेस ने तुरंत मौके का फायदा उठाते हुए यह आरोप लगा दिया कि चंद्रशेखर सरकार श्री राजीव गांधी की की जासूसी का रही है। उन्होंने यह मांग की कि तुरंत हरियाणा की श्री ओम प्रकाश चौटाला सरकार को बर्खास्त कर दिया जाए। और 6 मार्च 1991 को कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया। राष्ट्रपति ने इनको अगले प्रधानमंत्री के चुने जाने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहने को कहा तथा मध्य विधि चुनाव की घोषणा कर दी। इसी दौरान क्योंकि बजट भी पेश नहीं हुआ था आर्थिक स्थिति बिगड़ती जा रही थी। सरकारी खजाने में सिर्फ कुछ सप्ताह के लिए ही विदेशी मुद्रा बची थी। कई विषयों में जैसे कच्चे तेल में हम पूरी तरह विदेश पर निर्भर थे। ऐसे में बहुत बड़ा वित्तीय संकट खड़ा हो गया। अंत में रिजर्व बैंक की सलाह से सोना गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा ली गई। इस पर देश में बहुत हल्ला मचा।
20 मई 1991 को आम चुनाव का पहला दौर पूरा हुआ था। 21 मई 1991 की रात जब सब सोए हुए थे अचानक अपूर्व के कमरे में फोन की घंटी बजने लगी। रात का 1:00 बज रहा था। संधि ने उठकर फोन उठाया। उसके पिताजी का फोन था। उन्होंने बताया कि श्री राजीव गांधी की श्रीपेरंपुदुर में एक चुनावी सभा के दौरान हत्या कर दी गई है। सन्धि का पहला प्रश्न था "किसने की"। तब तक अपूर्व भी उठ चुका था। उसने प्रश्नवाचक नजरों से संधि की तरफ देखा तो बोली "बड़ी बुरी खबर है कि श्री राजीव गांधी की तमिल आतंकवादियों ने हत्या कर दी"। तब तक फोन बंद हो चुका था। अब दोनों ही चिंता में पड़ गए थे। अभी भी 1984 के दंगों की याद आ जाती थी। दोनों चिंता में डूब गए। शांडिल्य को भी उठा कर आदेश दिए गए कि वह कल बाहर न निकले। सब ने अपने अपने दोस्तों को फोन कर दिया। अपूर्व को याद है कि सब कैसे सहमे हुए थे। अगले दिन सुबह से सारे देश में गम का माहौल था। मगर यह खैरियत है कि कहीं पर भी हिंसा की कोई खबर नहीं थी। केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार काफी सजग थी। 1984 के दंगों को लोग भूले नहीं थे। तभी चुनाव के अगले दो दौर स्थगित कर दिए गए l बाद मे विस्तार से जानकारी टी वी पर आने लगी कि 21 मई, 1991 को रात दस बज कर 21 मिनट पर तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर मे तीस साल की एक नाटी, काली और गठीली लड़की चंदन का एक हार ले कर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी की तरफ़ उनके पैर छूने के लिए झुकी l तभी कानों को बहरा कर देने वाला धमाका हुआ l सभा स्थल पर बहुत पीड़ा जनक हालात थे l चारो तरफ मानव अंग बिखरे पड़े थे l श्री राजीव गांधी की तलाश शुरू हुई l उनके कपड़ो और घडी से उनके मृत शरीर को पहचाना गया l उनके पार्थिव शरीर को दिल्ली लाया गया और अंतिम संस्कार किया गया l उनकी हत्या लिट्टे के लोगो द्धारा की गई थीl कुछ ही महीनो में इस हत्या के आरोप में एलटीटीई के सात सदस्यों को गिरफ़्तार कर लिया गया l मुख्य अभियुक्त शिवरासन और उसके कई साथियों ने गिरफ़्तार होने से पहले साइनाइड खा लिया l
14 और 15 जून 1991 को चुनाव का दूसरा दौर शुरू हुआ और फिर चुनाव पूरे किए गए। चुनाव के रिजल्ट आए कांग्रेस को 244 सीटें मिली। पंजाब और कश्मीर में चुनाव नहीं हुए थे। इस चुनाव की एक विशेषता यह रही कि इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी एन शेषण थे। उन्होंने अपने अधिकारों का प्रयोग कर कई सख्त फैसले लिए। उनसे पहले चुनाव आयोग को सरकार का एक पारंपरिक कार्यालय माना जाता था। जिसका काम सिर्फ सरकार के आदेशों का पालन करना था। मगर श्री टी एन शेषण ने चुनाव आयोग की महत्ता का एहसास कराया। खैर सरकार बनाने की कोशिश शुरू हुई l सबसे पहले श्रीमती सोनिया गांधी का नाम आगे आया। मगर 7 साल में घर के दो संरक्षकों की निर्मम हत्या के बाद खुद को या अपने परिवार को बहुत असुरक्षित महसूस कर रही थी। उन्होंने आगे आने से इंकार कर दिया। तब तक कांग्रेस का यह हाल था कि नेतृत्व की 2nd लाइन बनाने को कभी महत्व ही नहीं दिया गया था। पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय में स्वतंत्रता संग्राम के कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे l इसलिए श्री लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेता को एकदम चुना जा सका। वैसे भी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने श्रीमती इंदिरा गांधी को अपने उत्तराधिकारी के रूप में कभी आगे नहीं बढ़ाया था। मगर श्रीमती इंदिरा गांधी जब श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री बनी और अपने स्वतंत्र निर्णय लेने शुरू किए, तब स्वतंत्रता संग्राम के कई बड़े नेता संगठन से अलग हो गए। उन्होंने अपनी पार्टी अलग बना ली या अन्य पार्टी जॉइन कर ली। दूसरा श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपनी इमेज को इतना बड़ा कर दिया कि कांग्रेस में कोई उनका विरोध ही नहीं कर पाता था। साथ ही साथ ही श्री संजय गांधी को अपने उत्तराधिकारी के रूप में विकसित किया। मगर श्री संजय गांधी की दुर्घटना में मृत्यु के बाद उन्होंने ही श्री राजीव गांधी को राजनीति में खींच लिया। हालांकि श्री राजीव गांधी पहले राजनीति में आने को तैयार नहीं थे, मगर बाद में उन्हें श्रीमती इंदिरा गांधी के आग्रह करने पर राजनीति में आना पड़ा। मगर अब उनकी भी आसमायिक हत्या के बाद कांग्रेस में नेतृत्व का अभाव स्पष्ट नजर आ रहा था। श्री प्रणब मुखर्जी तो श्रीमती सोनिया गांधी की प्राथमिकता में नहीं आते थे। बताया जाता है की श्रीमती सोनिया गांधी की प्रथम पसंद श्री शंकर दयाल शर्मा थे। उन्हें संदेश भी भेजा गया था। मगर उन्होंने अपनी आयु और सेहत का हवाला देकर इंकार कर दिया। तभी श्री पी वी नरसिम्हा राव का नाम श्रीमती सोनिया गांधी को उनके सहयोगियों ने सुझाया। उस वक्त श्री पी वी नरसिम्हा राव आंध्र प्रदेश जाने के लिए सामान बांध रहे थे, क्योंकि उन्हें पार्टी ने राज्यसभा की टिकट देने से इंकार कर दिया था। उन्हें भी संदेश भेजा गया और उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया। इस तरह उन्होंने 21 जून 1991 को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। डॉक्टर मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री के रूप में लाया गया। यह सब सोचते सोचते अपूर्व अपने घर पहुंच गए l
घर पहुंचा तो संधि और शांडिल्य घर पर आ चुके थे। शायद उनमें कोई बहस होकर चुकी थी। अपूर्व चुपचाप अपने कमरे में गया तथा हाथ मुंह धो कर कपड़े बदलकर ड्राइंग रूम में आ गया। अपूर्व ने शांडिल्य से पूछा "हाउ वास योर डे "। यह तो बात शुरू करने का एक बहाना था। शांडिल्य भड़क कर बोला "पापा, मम्मी जनवरी के प्रथम सप्ताह में कंपनी के काम से यूरोप के टूर पर जा रही हैं। मैंने कहा मैं भी चलूं तो मना कर रही है। बोल रही है कि मैं तो काम करूंगी, तुम अकेले वहां क्या करोगे।" अपूर्व ने प्रश्नवाचक नजरों से संधि को देखा। संधि बोली "उसके जाने का खर्चा फालतू ही कंपनी पर पड़ेगा"। अपूर्व को यह सुनकर बहुत बुरा लगा क्योंकि संधि के पिता तो अपूर्व को पसंद नहीं करते थे। अपूर्व ने भी कभी संधि के पिता से कोई आर्थिक मदद की उम्मीद नहीं की थी। इसलिए वह संधि के साथ उसकी विदेश यात्रा पर नहीं जाता था और न ही उसे इसका कभी कोई निमंत्रण मिला था। यह वह दौर था जब नारी कार्यक्षेत्र में उतर तो रही थी मगर शादीशुदा होने के बावजूद वह अकेले अपने सहयोगियों के साथ विदेश यात्रा पर चाहे भले ही उसका बॉस क्यों न हो समान्यत: नहीं जाती थी। मगर अपूर्व चुप रहता था क्योंकि उसे मध्यम वर्ग से उठकर संभ्रांत वर्ग में जाने की कुछ मानसिक कीमत तो चुकानी ही पड़ रही थी। एक मध्यम वर्ग से अगर कोई आहिस्ता आहिस्ता उन्नति करके उच्च वर्ग में जाए तो वह अपने को हर कदम पर एडजस्ट करता रहता है, मगर अगर कोई एकाएक वर्ग परिवर्तन करता है और वह भी किसी और की वजह से, तो बीच में जो अंतर आ जाता है वह खाली रह जाता है। जो उसे तंग करता रहता है। यह अंतर ही अपूर्व और संधि के बीच आ चुका था।
तब संधि मुड़कर बोली "क्या आप समझते हैं कि मैं इसे पैसे की वजह से नहीं ले जाना चाहती"। अपूर्व ने गुस्से से पूछा "और क्या कारण है यह इतना बड़ा तो हो चुका है कि इसे टैक्सी हायर कर दो तो यह अकेला घूम फिर सकता है। और अगर पैसे की बात है तो खर्चा मैं उठा सकता हूं। और अगर कोई अन्य कारण है तो वह तुम्हें पता होंगे मैं न जानता हूं न जानना चाहता हूं"। शांडिल्य बीच में पड़ता वह बोला "आप कृपया करके बहस बंद करें मैं अब जाना ही नहीं चाहता"। इस तरह उनकी गृहस्थी पहलेे ही कुछ बिखरी हुई थी अब कुछ और ढीली हो गई ।सब ने खाना खाया और अपने अपने कमरे में चले गए। इसी तरह जिंदगी चलती रही। संधि अकेले यूरोप का टूर करके आ गई। किसी ने फिर इस विषय पर कोई बात नहीं की। तीनों ही अपने अपने चारों तरफ इस अकेलेपन का घेरा बनाए चलते रहे। तीनों को लगता था कि कम से कम हम भावनाओं के रेगिस्तान में अकेले तो नहीं है, चाहे कहने के लिए ही सही एक घर तो है और कुछ रिश्ते तो है।
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Life was going as usual. Apoorva was not taking part in the union activities. One day the secretary of the union called him and ask "Apoorv now a days you are not coming to the union office and also you are not active in Union." Apoorva said " Actually, I am busy in my family affairs so that's why I am not able to concentrate on the union work". Then the secretary asked " Is it your family affairs or somebody else family affairs are also included." Then Apoorv changed the topic. Apoorv knew that Secretary is pointing toward the Nisha. Apoorv changed the topic. After that call Apoorv started thinking about the fast few years. Actually after the disintegration of USSR there was almost complete silence in the union office. Union people were projecting the the USSR as a Paradise of workers before disintegration. But now they are not able to project it like that anymore as now Russia is a small country. From that time onward Apoorv also have some disillusion regarding the Russia and communism. That's why he was not active in the union also.
जिंदगी अपनी रफ्तार से चल रही थी। आजकल अपूर्व पहले की तरह यूनियन की काम में उतना सक्रिय भाग नहीं ले रहा था। तभी उनके यूनियन के जनरल सेक्रेट्री का फोन आया की आजकल आप यूनियन मे सक्रिय काम नहीं कर रहे, क्या बात है। तो अपूर्व ने कहा की अपनी कुछ परिवारिक समस्याओं में उलझा हुआ हूं इसलिए नहीं आ पा रहा हूँ। जनरल सेक्रेटरी ने हंसकर कहा "अपनी ही परिवारिक समस्याओं में उलझे हुए हो या किसी और की परिवारिक समस्याएं भी बीच में मिल गई है।" अपूर्व ने बात बदल दीl क्योंकि वह जानता था की जनरल सेक्टरी का इशारा निशा की तरफ है। अपनी बातचीत खत्म कर के अपूर्व का ध्यान पिछले कुछ वर्षों की घटनाक्रम पर चला गया । असल में जब से सोवियत रूस का विघटन हुआ, तब से यूनियन के अंदर एक अजीब सी निस्तब्धता थी। एक बड़ा सोवियत रूस अब एक छोटे से देश में परिवर्तित हो गया था। और अब रूस को कम्युनिस्ट लोग एक आदर्श की तरह नहीं पेश कर पा रहे थे। तबसे अपूर्व के मन में कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति कई तरह की भ्रांतियां थी। इसलिए वह यूनियन में भी निष्क्रिय हो गया था। जब सोवियत रूस का विघटन हुआ तब वहां की जनता बड़े बड़े मॉल और विदेशी सामान की ललक में अपना आपा खो बैठी।
In India Dr Manmohan Singh was inducted as Finance Minister of India. When Dr Manmohan Singh was Governor of Reserve Bank of India he was known for his leaning toward the Socialism. Now Mr PV Narasimha Rao had given him the responsibility of making stable the detroiting condition of of economy of the country. USSR was disintegrated and there was no hope from USSR. While International Monetary Fund and World Bank were putting the pre conditions of globalisation of Indian economy and opening of the Indian market for world. This condition would take our economy towards the capitalism. Under these circumstances Dr Manmohan Singh presented his first budget in July 1991. In this budget he had promised globalisation and openness of the economy. Hot discussions were started among the countrymen.
इधर भारत में सरदार मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया गया। जब मनमोहन सिंह रिजर्व बैंक के गवर्नर थे तब उन्हें वामपंथी विचारधारा का समर्थक माना जाता था। मगर अब श्री पी वी नरसिम्हा राव ने उन्हें रसातल की ओर जाती हुई अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने की जिम्मेदारी सौंपी। सोवियत संघ टूट चुका था। वँहा से कोई मदद की उम्मीद नही थी।वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सिर्फ अपनी शर्तों पर ही कर्ज देने को तैयार था। यह शर्तें हमारे देश को पूंजीवादी व्यवस्था की तरफ ले जाती थी। इन हालातों में जुलाई 1991 में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने अपना पहला बजट पेश किया। इस बजट में वैश्वीकरण उदारीकरण तथा बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का वायदा किया गया था। लोगों में उस पर बहस बड़ी प्रमुखता से हो रही थी।
One day got a call from Nisha she told " the computerization is accelerated in bank. So bank has organised a training program in Chandigarh in which my and your names are there. So I got my and your tickets booked in AC bus(that was the best option in 1991)for Sunday". Apoorv said "thank you very much I will be there well in time." In the evening Apoorv told this to Sandhi and Shandily. But nobody cared much on this, because their relationship is at such a point where they understand the relations but they do not recognise those.
तभी एक दिन निशा का फोन आया और उसने अपूर्व को बताया की कंप्यूटरीकरण की प्रक्रिया बैंक में तेज हो रही है। उसी संदर्भ में अगले सोमवार से चंडीगढ़ में 1 सप्ताह के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम रखा गया है। लिस्ट में उन दोनों का नाम है l इसलिए उसने चपरासी को भेजकर दोनों कि रविवार दोपहर की एसी बस की टिकट मंगा ली है। अपूर्व ने निशा को धन्यवाद कहा और रविवार को अंतरराष्ट्रीय बस अड्डे पर मिलने का वादा किया। (1991 में यही सुविधा मुख्य थी)। घर आकर अपूर्व ने संधि और शांडिल्य को इसकी सूचना दे दी। मगर किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। शायद उनके रिश्ते आपस में उस स्तर पर पहुंच चुके थे, जहां रिश्ते सिर्फ एहसास किये जाते हैं माने नहीं जाते।
On Sunday Sandhi went to see his client her client. Shandily went to see his friends. At last Apoorv himself took an auto and reached ISBT. Just 5 minutes before the departure of the bus Nisha and Jivesh both reached there. Jivesh immediately gave luggage to the the conductor and in the meantime the driver started the bus. Both Nisha and Apoorv said bye to the the Jivesh and get into the bus. When the bus started both of them took the seat. After sitting Apoorv asked "Nisha how you arranged for the the Vatika. Nisha said " Sir, it was very hectic today. In the morning I got up and packed my luggage. Then I pack the luggage of Vatika to drop her at grandma house. Then prepared three dishes for Jivesh and then came to ISBT." While smiling Apoorva said "Nisha stop calling me sir, otherwise people will think that a Boss is flirting his employee and taking her on tour". Nisha said "Sir now you tell how could I call you. We don't have any social relationship. You are elder than me so I can't call you by name. What to do please tell". Apoorv said "May be you are right. Because every relationship has some duties and expectations attached to it. Even in friendship some expectations are there. Anyway leave it now. Tell what is the latest in Smriti case." Nisha said "Please leave this topic as I am least bothered about Jivesh having relationship with other girls. There is no doubt that he is my first love and he has introduced me with the divine feelings of first love. It is such a feeling that nobody can have second time in life. But now the the relationship has reached such a stage that I hold his one hand and least bothered who is holding his other hand."
रविवार को संधि सुबह ही कंपनी के काम से किसी पार्टी को मिलने चली गई। शांडिल्य अपने दोस्तों के पास चला गया। अपूर्व अकेला ही ऑटो पकड़ कर बस अड्डे पहुंच गया। वह शायद जल्दी आ गया था। बस की टिकट भी निशा के पास थी। बस चलने के 5 मिनट पहले निशा और जीवेश भागते हुए आए। जिवेश ने अपूर्व से हाथ मिलाकर औपचारिकता की तथा सामान बस के हेल्पर को दे दिय इतने में कंडक्टर ने आवाज लगाई तथा दोनों जीवेश से विदा लेकर बस में चढ़ गए। बस चली और दोनों बैठ गए। तो अपूर्व ने पूछा "वाटिका का क्या इंतजाम किया"। निशा बोली "सर आज सुबह से ही भागदौड़ हो रही थी। अपना समान पैक किया। वाटिका का सामान पैक किया । उसे मम्मी के यहां छोड़ कर तब यहां आ पाई। जीवेश के लिए भी तीन डिश बनाकर रख आई हूं।" अपूर्व हंसकर बोला "देखो निशा मुझे सर कहना बंद करो। नहीं तो लोग समझेंगे कि कोई बॉस अपनी सेक्रेटरी को टूर के बहाने घुमाने ले जा रहा है।" निशा बोली "तो आप ही बताएं कि आपको क्या बुलाऊं। सामाजिक रिश्ता हमारा कोई है नहीं। आप मुझसे बड़े हैं। न मैं आपका नाम ले सकती हूं। ए जी ओ जी वाला संबंध भी नहीं है।" इस पर अपूर्व बोला "बात तो तुम्हारी ठीक है। हर रिश्ता हमेशा बंधन में डालता है। जहां पर कुुुछ अधिकार, कुछ कर्तव्य होते हैं। दोस्ती के रिश्ते में भी कुछ अपेक्षाएं तो होती हैं,और शारीरिक आकर्षण वाली उम्र से शायद हम काफी हद तक निकल चुके हैं। फिर भी जब साथ होते हैं तो कुछ अच्छा एहसास होता है। कुछ अलौकिक सा कुछ ऐसा जो बयान नहीं किया जा सकता है। छोड़ो निशा वह स्मृति वाले किस्से का क्या हुआ"। निशा बोली "छोड़िए जीवेश की हरकतों ने मुझे उसके प्रति उदासीन कर दिया है। हालांकि मैं अभी भी उसे दिल से चाहती हूं। वो मेरा पहला प्यार है। उसने ही मेरे जीवन में सर्वप्रथम प्रेम का संपनदन किया था। पहले प्रेम के एहसास के नशे की खुमारी पूरी जिंदगी रहती है। वह संपनंदन फिर कभी जिंदगी में नहीं हो सकता। अब तो रिश्ते इस हद तक आ चुके हैं, जब सिर्फ एक दूसरे के उस हाथ तक की नजर रहती है जो आप आप ने पकड़ा हुआ है। दूसरे हाथ की तरफ तो ख्याल ही नहीं जाता कि वहां कोई है कि नहीं।"
In the meantime conductor started the VCR. All got busy in enjoying the songs and film. But as Nisha was tired so she went into the sleep by putting her head on the shoulders of Apoorv. When they reached Chandigarh, it was dark in the evening. They took an auto and reached the training centre. People from all over India were to come there for the the training. The Roommate of Nisha had already reached but the roommate of Apoorv had not reached. In the night that took their dinner and went to sleep. The girl participants were arranged to stay at first floor while the men participant were arranged to stay on ground floor.
The training started next day. First of all the instructor gave the introduction of the agenda of the training program. The instructor said "computerisation is necessary because we are going to open our banking sector for the foreign banks. Just to compete with them computerization is needed in the Indian banking sector also. Gurmail Singh said "computers are necessary only there where bulk data is coming and we want urgent results." Janvi said "We shall not open our banking sector for the foreign banks because in western countries the deposits are are available with the banks on a very low rate of interest. In some countries even Bank maintenance charges are taken from the depositor. in this way They can lend money at a very low rate of interest, while our banks are getting money at very high rate of interest. If they want to compete with the foreign banks they have to reduce the interest rates on the deposits. That will affect a large number of depositers and some of them are running their livelihood only from the interest on their deposits.
तभी कंडक्टर ने वीसीआर से बस में टीवी पर गाने लगा दिए तथा सब उसे देखने लगे। आहिस्ता आहिस्ता निशा नींद की आगोश में चली गई और अपूर्व के कंधे पर सर रखकर कर सो गई। अपूर्व अभी तक यही सोच रहा था कि इस रिश्ते को क्या कहे। नवंबर का महीना था पहुंचते-पहुंचते काफी अंधेरा हो गया था। उन दोनों ने आटो पकड़ा और अपने ट्रेनिंग सेंटर पहुंचे। सारे देश से लोग आने वाले थे। अपूर्व का रूममेट अभी पहुंचा नहीं था। मगर निशा की रूम मेंट पहुंच गई थी। महिला प्रशिक्षणार्थी पहले प्रथम तल और पुरुष ग्राउंड तल पर थे। रात को ज्यादा बात नहीं हुई और खाना खाकर अपने अपने रूम में दोनों सो गए। अगले दिन सुबह ट्रेनिंग शुरू हुई सबसे पहले तो यह रिवयु हुआ कि कंप्यूटरीकरण क्यों जरूरी है। इस पर कई तरह के विचार आए। सर्वप्रथम तो प्रशिक्षक ने अपने विचार रखे कि वैश्वीकरण के इस दौर में जब आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू हो रही है, तो हमें विश्व स्तर की बैंकिंग सेवाएं देने के लिए कंप्यूटर की जरूरत है । वरना हमारे बैंक पिछड़ जाएंगे। उस पर गुरमेल सिंह ने अपने विचार रखते हुए कहा" कंप्यूटर का इस्तेमाल सिर्फ वहां पर होना चाहिए जहां मानव द्वारा कार्य करने में समय लगता है। आम तौर पर जहां बहुत ज्यादा डाटा एकदम आता है, और नतीजा हमें जल्दी चाहिएl जैसे कि रिकांसिलेशन डिपार्टमेंट इत्यादि। जानवी का यह कहना था कि बैंकिंग सेक्टर को विदेशी बैंक के लोगों के लिए खोलना ही नहीं चाहिए। एक बार विदेशी बैंक अंदर आ गए तो हमारी पूरे अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर लेंगे। क्योंकि उन्हें अपने देश में जमा पैसे पर बहुत कम ब्याज देना पड़ता है और कहीं-कहीं तो बिना कोई ब्याज के ही जमाकर्ता खाते में पैसे के रख रखाव का अलग से खर्चा देते हैं। वह हमारे देश में एक तरफ तो ऋण बहुत सस्ते में देंगे जिससे हमारे बैंकों को नुकसान होगा। क्योंकि उन्हें जमाकर्ताओं को जमा राशि पर ब्याज देना होता है। दूसरी तरफ अगर बैंक अपने पास जमा खातों में ब्याज दर कम करते हैं, तो करोड़ों लोगों पर जिसमें वृद्ध ज्यादा हैं, उन पर बुरा असर पड़ेगा। कई लोगों की जिंदगी तो जमा रकम के ब्याज पर ही चलती है।
Subhrao gave his viewpoint "left ideology is vanishing from the world and capitalism is gaining. We Shall get ready our banks to compete with the foreign banks. For that computerisation is necessary. Apoorv said "this is our economic compulsion to follow the preconditions of IMF and World Bank. Under the compulsions we are opening our Banking industry for foreign banks. But before opening we must have a strong infrastructure to adjust that changes. Mind it, when we open a window for fresh air then net is necessary to prevent mosquitoes and flies from entering into the room". in the meantime the indication was given for the lunch time and that class ended there. In the afternoon session one more class were held and the day end was announced.
सुबाराव का कहना था कि वामपंथी विचारधारा पूरे विश्व से मरती जा रही है और विश्व पूंजीवादी व्यवस्था की तरफ बढ़ रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में हमारे बैंकों को खड़ा रहने के लिए अपने को विश्वस्तरीय प्रतियोगिता के लिए तैयार रखना चाहिए। इसलिए कंप्यूटरीकरण जरूरी है। अपूर्व ने कहा कि हमारी आर्थिक मजबूरी है कि हम आईएमएफ और विश्व बैंक के दबाव में उदारीकरण कर रहे हैं। मगर हमें उदारीकरण अपनाने से पहले उसके लिए अपने ढांचे को तैयार करना चाहिए था। उदारीकरण की खिड़की खोलने से पहले खिड़की में जाली लगाने जरूरी है। ताकि कहीं एकदम खिड़की खोलते ही ताजी हवा के साथ मक्खी मच्छर अंदर आकर वातावरण को खराब न कर दें। इतने में चपरासी ने आकर खाने का इशारा किया और लंच ब्रेक हो गया। लंच के बाद कंप्यूटर पर चर्चाएं हुई और शाम को क्लास खत्म हो गई
When Apoorv came back to his room he found that his room partner Mr Gurcharan Singh Kohli had reached and adjusted his luggage. He has reached today morning only from Amritsar. He belongs to Amritsar but working in branch of Mall Patiala. As Apoorv listened the name of Patiala the taste of 'Puri Chhole of Mota Halwai' and 'Kachori of Sadhu Ram halvai' refreshed his memories. He asked Kohli "Is the 'gajar pak' of Triveni Chauk is still available in Patiala". Now this was the turn of the Kohli to get shocked. He asked "how you know this much about Patiala." Then Apoorv told that he had studied in Patiala for one year. In the meantime there was a knock on the door and Nisha entered and said "this is the dinner time, so please stop studies and let us go to the dining hall". The Apoorv put up his sleeper and they moved to the dining hall.
कमरे में आकर अपूर्व ने देखा कि उसका रूम पार्टनर गुरशरण सिंह कोली अपना समान ठीक कर रहा था। वह आज सुबह ही आया था और अमृतसर से आया था। उससे बातचीत हुई तो पता चला कि वह माल पटियाला में काम करता था। पटियाला का नाम सुनकर अपूर्व चौंक गया। अरना वरना चौक में साधु राम हलवाई की कचोरी और मोटे हलवाई के पूरी छोले की सुगंध और स्वाद एकदम उसके नाक मुंह में ताजा हो गई। उसने गुरसरन से पूछा "यार त्रिवेणी चौक का गाजर पाक अभी भी मिलता है क्या"। गुरुचरण सिंह एकदम चौक गया और उसने पूछा "आप कैसे जानते हो"। अपूर्व ने उसे बताया कि 1 साल वह पटियाले में पढ़ चुका है। अपूर्व तब पटियाले की यादों में खो गया। तभी कमरे को किसी ने खटखटाया अपूर्व को पता नहीं चला और गुरुशरण ने खोला। बाहर से निशा ने अंदर आते हुए कहा "थोड़ी पढ़ाई करो l खाने का टाइम हो गया है।" अपूर्व ने भी स्लीपर डाले और खाने के कमरे की तरफ चल दिए।
So many people had already reached the dining hall. In the dining hall there was one big table around which 15 to 16 chairs. Because Apoorv and Nisha both were in union that's why other people were interested to have discussion with them on on Bank's politics and Indian politics. Shailaja asked Apoorv "Please tell what will be the impact of this globalisation on India. Apoorv said "See Shailja now the world has become unipolar from bipolar. Now America is the only Super Power. America has emerged as a big power after Second World War. In second world war Britain was feeling difficulty in holding its colonies. In second world war Japan surrender when two nuclear bomb were dropped on Hiroshima and Nagasaki. Hitler sucide and Germany was divided into two countries. During the Second World War Netaji Subhas Chandra Bose in collaboration with Japan has reached Burma also. That made the situation of Mahatma Gandhi very awkward. People were getting disillusioned from Mahatma Gandhi because he was taking back the calls of agitation frquently. To countetr the increasing impact of the Netaji Subhas Chandra Bose, Mahatma Gandhi gave the call of 'Quit India Movement'. Though some leaders of Congress were not in the favor of this agitation. But this movement picked up all over India. The Industrialist of India were Supporting the Mahatma Gandhi because they were interested that if the British government go back then they would get a chance to have their own industry. At the end of Second World War there was a change in Government in England. Also in the meantime Netaji Subhash Chandra Bose died in a plane crash. The new British government promised Independence to the India. After Second World War USA and USSR word emerged as a new superpowers of the world. The American style of having Colony was different from that of British. In American style of colonies they keep the countries independent politically but they make it Colony economically. India had kept itself as free Economy with the help of USSR. But after the disintegration of USSR India could not bear the pressure of International Monetary Fund and World Bank. Indian government surrendered to the pressure and it will have long lasting impact on the India."
खाने के कमरे में काफी लोग आ चुके थे। एक बड़ी टेबल पर करीब 15 -16 लोगों के एक साथ बैठने की व्यवस्था थी। क्योंकि अपूर्व और निशा दोनों यूनियन की कार्यसमिति के थे, इसलिए सब उनसे राजनीति और बैंक की बातों पर बात करने की उत्कंठा रखते थे। शैलजा ने अपूर्व से पूछा "आप बताएं कि सरकार की इस उदारीकरण का भारत की सामान्य जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा।" अपूर्व सोचते हुए बोला "देखो अब विश्श्व में द्विपक्षीय व्यवस्था न होकर एकपक्षीय बन गया है। अब संसार पर अमेरिका का एकछत्र प्रभाव रहेगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरा है। जहां विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन के उपनिवेश अब उन से संभाले नहीं जा रहे थे, वंही भारतीय पूंजीपति भी अब देश मे कारखाने लगाने लगे थे। वह भी चाहते थे कि अंग्रेज यहां से जाएं ताकि यहां का व्यापार भारतीय पूंजीपतियों को मिले। इसलिए वह महात्मा गांधी का समर्थन तथा सहयोग करने लगे और उनको आर्थिक मदद भी देते थे। महात्मा गांधी से भारतीयों का उस वक्त मोहभंग हो रहा था। क्योंकि वह बार-बार अपना आंदोलन वापस ले लेते थे। उधर नेताजी सुभाष चंद्र बोस बर्मा तक पहुंचे गए थे। गांधी जी को डर था कि कहीं जनता नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ मिलकर हथियार न उठा ले। नेताजी की बढ़ती लोकप्रियता से महात्मा गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ दिया। हालांकि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इसका विरोध में थे। मगर पूरे देश में आंदोलन जोर पकड़ गया। विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन में सरकार बदल गई। नई सरकार ने यह वचन दिया कि वह भारत को आजाद कर देंगे।
जब विश्व युद्ध समाप्त हुआ तब जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में अमेरिका ने परमाणु बम बरसाए। जिससे जापान में भारी तबाही हुई। जापान ने हथियार डाल दिए। हिटलर ने आत्महत्या कर ली। जर्मनी को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया गया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। तब ही ब्रिटेन में सरकार बदल गई और नई सरकार ने भारत को स्वतंत्र करने का वचन दे दिया। अब उपनिवेशवाद का स्वरूप बदल गया था। अब ब्रिटेन की बजाय अमेरिका और रूस विश्व की सबसे बड़ी शक्तियों के रूप में उभर रहे थे। अमेरिका के उपनिवेशवाद का आधार आर्थिक है। वह राजनीतिक रूप से देश को स्वतंत्र रखते हैं, मगर आर्थिक रूप से उपनिवेश बना देते हैं। भारत पर उनकी नजर बहुत देर से थी। सोवियत संघ रूस की सहायता से भारत अपने आप को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाए रखने में कामयाब रहा। मगर रूस के विघटन के बाद आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के दबाव को सह नहीं पाया और सरकार ने उनकी शर्तों को मान लिया। इसके दूरगामी परिणाम अभी आगे देखने को मिलेंगे।
Then Shailja said "Apoorv you have given only the one sided picture. Is it not a fact that Communism has failed in Russia". Apoorv said "ideology never ends. The problem is always with implementation. If instead of engaging itself in a competition with USA, the USSR had given more attention to its growth and instead of having progress on the surface, had the USSR taken this growth to the village level, then the story may have been different. But right from the beginning USSR are in competition with USA. It was trying to show itself better in the field of warheads and space crafts. The countries under communist ideology always face two type of dangers. One is failure of internal democracy and other is intolerance toward the protests of people. USSR was having both the problems. Common people were frustrated and lured towards the the high rise malls of West and other facilities. This is not true that everybody in USA is happy. There are slums which are worse than even India. But since USA is a capitalist economy so their governments have very little duties toward their countrymen. They have made it very clear to people "you can have any facilities if you have the capacity to pay that".
तब शैलजा बोली "यह तो आपने एकतरफा बात कर दी। क्या कम्युनिस्ट विचारधारा से रूस फेल नहीं हुआ था।" अपूर्व बोला "विचारधारा कभी खत्म नहीं होती। प्रश्न यह है कि हम किसी भी विचारधारा को किस तरह से लागू करते हैं। अगर रूस शुरु से ही अमेरिका के साथ प्रथम बनने की प्रतिस्पर्धा में न पढ़कर अपने देश को आर्थिक रूप से मजबूत करता तथा विकास सिर्फ दिखाने के लिए नहीं बल्कि धरातल पर गांव गांव तक ले जाता तो आज यह नौबत नहीं आती। कम्युनिस्ट पार्टी के राज में जो सबसे बड़ा खतरा होता है, वह पार्टी के अंदर के प्रजातंत्र का खत्म होना। रूस ने दोनों ही गलतियां की l पार्टी के अंदर भी प्रजातंत्र खत्म हो गया था। कोई भी सरकार की कमियों के खिलाफ बोल नहीं सकता था। विकास ऊपरी स्तर पर था। लोगों को खाना देने या उनके रहन-सहन की सुविधा देने की बजाय ध्यान हथियार बनाने, आंतरिक्ष में जाने पर लगा रहा । आम जनता त्रस्त थी। दूसरी तरफ उन्हें पश्चिम की चकाचौध आकर्षित करती थी। ऐसा नहीं था कि अमेरिका में सब खुश हैं या हर कोई सुविधा संपन्न है। वहां पर भी गरीब बस्तियां हैं। वहां भी कई कमियां हैं, मगर वहां पर बोलने की आजादी है। कोई भी सरकार के खिलाफ अपनी आवाज उठा सकता है। वहां पर सरकार अपने नागरिकों को सुविधाएं देने के लिए बाध्य नहीं है। वहां मार्केट अर्थव्यवस्था है। जिसकी जेब में जितना पैसा है वह उतनी सुविधाएं ले सकता है।"
Shailja said "what is wrong in this". Apoorv said "problem is that in this type of system thats everything is weighed by profit and loss. Human feelings gets neglected, social feelings also start diminishing from the social system. Collective efforts are not there and in society the principle of 'Go Alone' dominates." Shailja said "Then in your view which system is better". Apoorv said "in my view the middle path is best. Competition must be there but only where it is necessary. Everybody shall have some fundamental right. Because everybody is in paying indirect taxes while purchasing anything for example they are paying GST when they purchase anything". Now it was getting late so they said 'good night everybody' and went to their rooms.
शैलजा बोली "तो इसमें बुरा क्या है"। अपूर्व बोला "इसमें बुराई यह है कि इसमें हर चीज को बाजार और फायदे नुकसान की नजर से देखा जाता है। समाज में मानवीय संवेदनाएं खत्म हो जाती हैं । सामूहिक प्रयास खत्म हो जाता है तथा समाज मे विघटन हो कर एकला चल की प्रवृत्ति बढ़ने लग जाती है।" शैलजा बोली "तो आपकी नजर में अच्छी व्यवस्था क्या है।" अपूर्व बोला "मध्य पथ पर चलना चाहिए। प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए मगर वहीं पर जहां जरूरी है। सामूहिक रूप से कुछ अधिकार हर एक को होने चाहिए। क्योंकि सेल टैक्स.चुंगी आदि तो हर कोई देता है चाहे प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से l तो कुछ सुविधाएं हर एक को मिलनी चाहिए।" तब तक रात काफी हो चुकी थी और लोग भी खिसकना शुरू हो गए थे। तो यह सब एक साथ उठकर गुड नाइट करके अपने अपने कमरे पर चले गए।
Next two days they attended the class in the the routine. In the evening the used to play some indoor or outdoor games. But on Thursday they suddenly rememberd that only two days were left in their stay. They decided in the morning that after the evening tea they will go to the the lake. So in the evening they hired an auto and went to the lake. It was a working day so only few people were there. Apoorv had been to the Chandigarh for so many time but Nisha had never came to Chandigarh. When they reached lake the wind was slightly cold and darkness of evening was coming down. The lights of Kalka were visible from the Lake side and it was giving a beautiful look. They started walking on the track on the bank of the lake.
अगले 2 दिन सामान्य रूप से कंप्यूटर की जानकारी तथा शाम को हॉस्टल में बैडमिंटन खेल कर बिताएं। बृहस्पतिवार को ध्यान आया कि अब तो ट्रेनिंग खत्म होने वाली है। चंडीगढ़ तो घूमने ही नहीं चला गया।अपूर्व तो पहले भी चंडीगढ़ आया था। मगर निशा पहली बार आई थी। अतः दोपहर को ही दोनों ने फैसला किया कि शाम को चाय पीकर चंडीगढ़ झील की तरफ निकला जाए। जैसे ही शाम को ट्रेनिंग खत्म हुई दोनों ने चाय पी तथा ऑटो पकड़ कर चंडीगढ़ झील पर पहुंच गए। कार्य दिवस होने की वजह से वहां ज्यादा भीड़ नहीं थी। हल्की हल्की ठंड थी। शाम का धुनधलका फैला हुआ था। झील के किनारे से सामने कालका की लाइटे चमकती नजर आ रही थी। दोनों झील के किनारे टहलने लगे।
Just to start with Apoorv said " See Nisha this Shelja is taking so much interest in politics. Why do not you ask her to join Union". Nisha said while smiling " In such a wonderful evening when I am with you then you are discussing the Union ". Then the Apoorv said" Please keep in your mind that you are with Apoorv and not with Jivesh." Then Nisha said " Had the Jivesh cared for me then I should not be here with you." Then Apoorv said "Yes Nisha husband and wife shall have atleast some similarity in their thinking. Otherwise the life become stand still. The husband and wife remains revolving in their own circle making kids as their centre. Nisha how you get married to Jivesh. I know that Jivesh is your first love. But are you also his first love." Nisha said " No, Jivesh belongs to a tribal in Mizoram. His father is having a small shop of daily consumable in his village. He was too attached to his mother. But his mother left his father and went away with someone else. Jivesh felt hurt due to this though it was a normal practice in their tribe. He was having one elder sister and one younger brother. When his sister got a job in Delhi, he came along with her for studying in Delhi. The younger brother remained there to help father. In a marriage function I have met him. In a marriage the girls generally start dreaming about their own marriage. I saw her in the marriage. He was quite smart and handsome. So I got attracted toward him. When Jivesh noticed that I am coming to his sister repeatedly, he read the dreams of my mind in my eyes and took help of his sister in getting introduced to me. I were a passed out from college at that time, looking for a job. One day when I was there Mansi (Jivesh sister) asked Jivesh to find out a good job for me. He promised and took me for interview on 2-3 Companies. But in the meantime I got an appointment letter from the bank and I joined here. But in the meantime we had expressed our feelings to each other. I came to know that Jivesh is having an advertising agency and he is a booking agent for advertisements for 2 news paper. We decided to get married. There was a strong resistance from my family. From Apoorv's side there was no resistance. We got married in an Arya samaj mandir and got our marriage registered with the help of Jivesh's sister and our friends. With the passage of time I got entry in to my parental house. My father had passed away just 2years back at that time. I had one elder brother who was married and one younger brother who was studying. But they couldn't filled up the gap of my father. My mother had started talking to me. But when ever my brothers saw Jivesh loitering with girls they always curse me for getting married to such a fellow. My problem is this I can not discuss my problems with any one because I fear that someone may not take benefits out of these. Then a silence spread between the two.
बातचीत शुरू करते हुए अपूर्व बोला "सुनो निशा यह शैलजा राजनीति में काफी दिलचस्पी रखती है। इसे यूनियन में सक्रिय करने की कोशिश करो।" निशा मुस्कुरा कर बोली "आप इतनी हसीन शाम को भी यूनियन के बारे में बात कर रहे हैं"। अपूर्व मुस्कुरा कर बोले "तुम जीवेश के साथ नहीं बल्कि अपूर्व के साथ घूम रही हो।" निशा गहरी सांस लेती हुई बोली "जीवेश के पास मेरे साथ इस तरह घूमने का समय या दिलचस्पी होती तो मैं आज आपके साथ यहां क्यों होती"। अपूर्व ने निशा की तरफ देखते हुए कहा "शायद तुम ठीक कहती हो। पति- पत्नी के सोचने की दिशा तो काफी हद तक एक जैसी होनी चाहिए। वरना जिंदगी खड़ी सी हो जाती है। दोनों अपने-अपने दायरे में घूमते रहते हैं और उनकी इकट्ठे रहने की धुरी बच्चे बन जाते हैं। निशा तुम्हारे और जीवेश के बीच में शादी का फैसला कैसे हुआ। यह तो पता है कि जिवेश तुम्हारा पहला प्रेम है। मगर क्या तुम भी जीवेश का पहला प्रेम हो"। निशा बोली "नहीं जीवेश मिजोरम कि एक आदिवासी प्रजाति में पैदा हुआ था। उसके पिता की एक छोटी सी रोजमर्रा की दुकान थी। वह एक बहन और दो भाई थे। जब जीवेश छोटा ही था, तब उसकी मां उसके पिता को छोड़कर किसी दूसरे आदमी के साथ चली गई। जिवेश अपनी मां से बहुत जुड़ा हुआ था। हालांकि उनके समाज में यह बड़ी आम बात थी। मगर जीवेश के मन पर इसका बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। वह बहुत उदास रहने लगा। जब उसकी बहन की नौकरी दिल्ली में लगी, तो वह भी दिल्ली पढ़ने के लिए आ गया। छोटा भाई गांव में पिता के काम में मदद करने लगा। तभी एक शादी के फंक्शन में मेरी उससे मुलाकात हुई। शादी के माहौल में वैसे ही मस्ती का माहौल होता है। किसी और की शादी को देखकर लड़कियां तो खास तौर पर अपनी शादी की कल्पना कर रही होती हैं। ऐसे में एक आकर्षक युवक को देखकर मेरे हृदय में भी हलचल मच गई। मैं जीवेश की तरफ आकर्षित हो गई। जिवेश ने जब मुझे बार-बार उसकी बहन के पास आते देखा और वह भी जब वह अपनी बहन के साथ हो तो उसने मेरी अनछुई इच्छाओं को मेरी आंखों में पढ़ लिया। शायद उसने अपनी बहन से भी इस बारे में बातचीत की। अब उसकी बहन ने मेरी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया। मैं तब कॉलेज से नई नई निकली थी और अपने लिए कोई नौकरी ढूंढ रही थी। अभी 2 वर्ष पूर्व ही मेरे पिता का देहांत हुआ था। मेरे बड़े भाई की शादी हो चुकी थी और छोटा अभी पढ़ रहा था। एक दिन बात चली तो जीवेश की बहन मानसी ने जिवेश से कहा कि वह मेरे लिए कोई नौकरी ढूंढ दे। तब मुझे पता चला कि जीवेश की एक अपनी छोटी सी एडवर्टाइजिंग एजेंसी है।वह दो तीन अखबारों के लिए विज्ञापन भी बुक करता था। इंटरव्यू के लिए भी मेरे को वह दो तीन जगह ले कर गया। इसी दौरान मैंने बैंकिंग सर्विस का इम्तिहान दिया थाl वहां से मुझे नियुक्ति मिल गई। मगर तब तक हमारा आपस में प्यार का इजहार हो चुका था। हमने शादी का फैसला कर लिया था। मैंने अपने घर में बात की तो वहां कड़ा विरोध हुआ। जीवेश के परिवार में कोई विरोध नहीं हुआ। आखिर हम दोनों ने जिवेश की बहन तथा अन्य मित्रों से मिलकर आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली और वह शादी रजिस्टर करा ली। कुछ समय बाद मेरी मां ने तो उसे स्वीकार कर लिया और मेरा वहां आना जाना शुरू हो गया। मगर भाई अभी भी अंदर से नाराज हैं और जब भी जीवेश को अन्य लड़कियों के साथ घूमते फिरते देखते हैं तो मुझे कई बातें सुनाते हैं। मेरी समस्या यह है कि मैं अपने दिल की बात भी किसी से नहीं कह पाती हूं, कि मेरी बात का कोई बतंगड़ ना बना दे। वाटिका भी छोटी है। इसलिए मुझे कोई बढ़ा निर्णय लेने की हिम्मत नहीं होती।" इतना कहकर निशा चुप हो गई।
While talking they came far on the bank of lake. The street lights were on. When they move from one pole to other pole then their shadow went on increasing but when they crossed a pole and enters the area of other pole it starts decreasing. The similar was their mindset. After a while Apoorv hold the hand of Nisha and said "let us sit there". They sat down on a bench on the bank of the Lake. Then Apoorva said "See Nisha under the present circumstances I will never ask you to to leave Jivesh. We may be quite liberal but even today our society do not accept the divorce women gracefully and do not give them the duo regards(1991). So many people will show sympathy with you but the moment they could not fulfill their illicit wish then they will start cursing you and defaming you. Vodka is too young at the moment and she needs both of you. If I seriously analyse your married life history then I judged that the Jivesh was so much attached to his mother but she left his father. He was very hurt at that time now after marriage he is trying to see his mother's glimpses in you. Because you are having leaning towards the left ideology and have independent view point, so he fear that you may not leave him. As far as you are concerned you also trying to find fatherly protection from Jivesh, because in the absence of your father your brother could not fill up that gap. The business of Jivesh is such that he is used to live a luxurious life and lot of glamour is available in his business. In most of the cases of divorce where kids are as young as Vatika, in their case the mother became the necessity and father became and attraction for kids. Because the kids occasionally meet Father so it is a picnic type meeting. While with mother they have to stay 24 * 7. It will put you in a very awkward condition situation. Just to avoid that it is better if you pull on with him Jivesh for the time being and when the Vatika grew up then you may take a transfer to some other City and even then I would not advise you to get apart from Jivesh."
वह बात करते-करते झील के किनारे काफी आगे निकल आए थे। दोनों चुपचाप चलते जा रहे थे। खंभों पर रोशनी जल गई थी। जब दोनों किसी खम्बे के नीचे पहुंचते तो उनकी परछाई खत्म हो जाती, जैसे ही वह आगे बढ़ते परछाई बनने लगती पर जैसे अगले खम्बे की रोशनी शुरू होती वो फिर आहिस्ता छोटी हो जाती है। फिर नए खम्बे के पास आकर दोनों ही परछाइयां शून्य हो जाती। शायद कुछ ऐसी ही दशा दोनों की हो रही थी। तभी अपूर्व ने निशा का हाथ पकड़कर कहा "चलो उस बैंच पर बैठते हैं।" बैठकर अपूर्व ने कहना शुरू किया "देखो निशा इस हालात में मैं तुम्हें कभी भी जीवेश को छोड़ने के लिए नहीं कहूंगा। हम जितने मर्जी स्वतंत्र विचार वाले हो मगर हमारा समाज अभी भी तलाकशुदा स्त्री को सही नहीं समझता।(1991 की बात) बहुत से लोग कुछ इरादों से तुम्हारे को हमदर्दी दिखाएंगे और जब वह अपने इरादों में कामयाब नहीं होंगे तो सबसे ज्यादा तुम पर कीचड़ उछालेगे। वाटिका अभी बहुत छोटी है। उसे दोनों ही चाहिए। तुम्हारे विवाहित जीवन को अगर ध्यान से देखें तो यह लगता है कि जीवेश अपनी मदर से बहुत जुड़ा था। वह शादी के बाद अपनी मां की प्रति छाया तुम्हारे में देखना चाहता है। तुम्हारे स्वतंत्र विचार और वामपंथी झुकाव को देख कर उसे लगता है कि तुम भी कहीं उसे छोड़कर न चली जाओ। उधर तुम भी अपने पिता का अभाव महसूस करती हो। तुम्हारे भाई तुम्हारे पिता का अभाव नहीं भर पाए। इसलिए तुम भी जीवेश में अपने पिता की प्रति छाया देखती हो। मगर जिवेश का बिजनेस ऐसा है कि वहां व्यक्ति के स्वच्छद आचरण की संभावना बहुत अधिक रहती है। जीवेश स्वच्छंद जीवन का आदी हो चुका है। मगर वाटिका को लेकर अगर अभी अलग हो गई तो, वह पिता का अभाव महसूस करेगी। बच्चों का मनोविज्ञान यह होता है कि जो सामने उपलब्ध होता है, वह तो उसकी जरूरत बन जाता है। और जो दूर होता है वह आकर्षण बन जाता है। अजीब सी स्थिति हो जाती है। इसलिए बेहतर होगा कि वाटिका के समझदार होने तक तुम एडजस्ट करो। फिर जब वाटिका समझने लगेगी तब अपनी बदली दूसरे शहर में करवाकर वाटिका के साथ चले जाना। तब भी बेहतर होगा कि उस संबंध को पूरी तरह ना तोड़ना।"
After that Apoorv looked at his watch and said "it's already too late let us move back." They came back to their hostel in an auto. In the way they both were dipped a deep in their thoughts. Nisha was thinking "Apoorv and Sandhi do not have anything common in their lifestyle and thinking. But still they are putting on together. One day I will ask him how he is Managing with Sandhi". On the other side Apoorv was thinking that what type of relationship is developing between him and Nisha. He do not have any expectation from Nisha, nor it is an attraction. But the time they spend together is always marvelous. While thinking all these they reached the hostel and said Good Night" and moved to there rooms. On Saturday certificates were distributed to them and in the afternoon they caught the Bus for Delhi. While coming back 5 people were there so the Nisha adjusted with girls. After reaching ISBT they said Goodbye and took auto for home.
इतना कहकर अपनी घड़ी देखते हुए अपूर्व ने कहा "चलो बहुत अब बहुत देर हो चुकी है"। दोनों ही चुपचाप अपने अपने ख्यालों में खोए ऑटो पकड़ कर होस्टल वापस आ गए। निशा सोचती रही कि अपूर्व और संधि के विचारों और रहन-सहन के बीच एक बड़ा विरोधाभास है। अपूर्व ने कैसे एडजस्ट किया किसी दिन जरूर पूछूंगी। उधर अपूर्व यह सोच रहा था कि उसका निशा से कैसा रिश्ता बनता जा रहा है। कोई अपेक्षा नहीं कोई आकांक्षा नहीं कोई आश्वासन नहीं बस कुछ पल बिताने की एक चाह। यह कैसा संबंध है। होस्टल पहुंच कर चुपचाप गुड नाइट कहकर अपने अपने कमरे में चले गए।
अगला दिन साधारण बिता फिर शुक्रवार आया जो कि हॉस्टल में रहने की आखिरी शाम थी। यह फैसला हुआ कि रात को सब इकट्ठे होंगे और मनोरंजन करेंगे। शाम को ट्रेनिंग के बाद सब लॉन में कुर्सियां बिछाकर बैठ गए। फैसला हुआ कि अपने अपने कॉलेज की एक एक मनोरंजक घटना सुनाएंगे। सबसे पहले अभिषेक ने कहा कि कॉलेज तो नहीं मगर स्कूल की एक घटना बताता हूं ।उसने कहा हमारे स्कूल में एक इंग्लिश के टीचर थे वह बहुत सख्त है उनकी एक आदत थी वो मुंह में छोटी इलायची डाले रखते थे। सबने उनकी छेड़ इलायची दाना रख दी थी। एक दिन हम चार-पांच लड़के घूम रहे थे। हमें वह सर अपनी बीवी और बच्चे के साथ मार्केट में घूमते दिखे। तभी हमेशा शरारत सूझी। हम उनके पीछे पीछे एक दूसरे को इलायची ओये इलायची ओये कहते घूमने लगे। वह बहुत छटपटाए मगर हमें तो कुछ कह नहीं सकते थे। अगले दिन जैसे ही उनका पीरियड शुरू हुआ उन्होंने हम पांचों को खड़ा कर दिया और पूछने लगे "कल तुम मार्केट में क्या कर रहे थे।" हमने कहा "सर घूम रहे थे।" वह बोले "तुम्हें अभी घूमना बताता हूंl तुम तो मुर्गा बन जाओ।" हमने मना कर दिया हम मुर्गा नहीं बनेंगे। हमारी दसवीं क्लास थी वह जोर जोर से चिल्लाने लगे। इतने में बाहर से प्रिंसिपल गुजरे। वह आवाज सुन के अंदर आ गए। और पूछा क्या बात है। वह टीचर बोले "सर कल शाम को यह लड़के मार्केट में घूम रहे थे और मेरे साथ बदतमीजी की।" प्रिंसिपल ने पूछा "क्या बदतमीजी की।" अब कहते टीचर क्या कहते। उन्होंने इतना ही कहा "सर यह बार-बार मुझे नमस्ते कर रहे थे।" प्रिंसिपल भी जानते थे और मुस्कुरा कर बोले "आगे से तमीज से नमस्ते करा करो और एक बार करा करो।" यह कहते हुए वो चले गएl
अब लड़कियों की तरफ से कविता ने एक किस्सा सुनाया ।उसने बताया कि जब हम सेकंड ईयर में थे तो हमारी ट्यूटोरियल क्लास होती थी। हम 6 लड़कियां थी हमारी प्रोफेसर एक अनमैरिड लड़की थी। तभी उसकी शादी हुई। एक दिन ट्यूटोरियल में आई तो सब लड़कियां एक दूसरे को कनखियों से देख कर मुस्कुराने लगी। प्रोफेसर पहले तो देखती रही। फिर उन्होंने पूछा "क्या बात है बड़ी खुश नजर आ रही हो"। तब एक लड़की ने पूछा "क्या मैडम आपके हस्बैंड के अंगूठे में चोट लगी हुई है"। प्रोफेसर ने पूछा "क्यों" I तो सब एक दूसरे की तरफ देख कर हंसने लगी। एक बोली "मैडम आप की बाजू पर नाखून के सिर्फ चार निशान हैं" इतना कहकर दूसरे के कंधे पर हाथ मार कर जोर से हंस पड़ी। प्रोफेसर पहले तो सकपका गई फिर उसने मुस्कुराकर बाजू पलट कर दिखा दी। बाजू पर अंदर की तरफ एक निशान था। अब लड़कियां सकपका गई और प्रोफेसर जोर से हंस पड़ी। इसके बाद कुछ लोगों ने गाने सुनाएं और उसके बाद सब खाना खाने चले गए। इस तरह से वह सांस्कृतिक संध्या खत्म हुई। अगले दिन सुबह सबको सर्टिफिकेट बांटे गए तथा दोपहर को सब अपने अपने शहर को चले गए। वापसी में दिल्ली तक जाने वाले पांच लोग हो गए थे इसलिए अपूर्व और निशा अलग-अलग बैठ कर आए तथा बस अड्डे पर ऑटो पकड़ कर अपने अपने घर चले गए।
In the way Apoorva was analysing that liberalisation will definitely have its impact on the the labour laws which means that the there will be reduction in the benefit of the labour. while supporting the Shower. V.P Singh government and Sh. P.V Narsimha Rao Government the left parties are also adopting the policy of Give and take. When the union started talking of the give and take policy then the workers definitely get disillusioned. Since the salaries of bank employees are better than salaries of employees of other sector, so now the bank employees are feeling ashamed of standing on the road and chanting the the slogans. Without agitation when the union enter the negotiations then definitely they cannot bring much for the employees and are forced to accept the week agreements.
अपूर्व सोच रहा था कि उदारीकरण के चलते सरकार पर दबाव आना शुरू हो गया है कि श्रम कानूनों में सुधार आरंभ करें। इसका सीधा मतलब था कि कामगारों के अधिकार कम करो। श्री वीपी सिंह सरकार का समर्थन करते हुए और अब श्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार को समर्थन करते हुए वामपंथी दलों की सोच में भी अब बदलाव आना शुरू हो गया है। अब उनकी विचारधारा में भी गिव एंड टेक की बात होने लगी है। एक बार यूनियन जब संघर्ष का रास्ता छोड़कर लेन-देन की बात शुरू करने लगे तो कार्यकर्ताओं का ढीला पढ़ना भी सवभाविक होता है। बैंक कर्मचारियों का वेतन हिंदुस्तान में अपने समकक्ष कर्मचारियों से काफी अच्छा था। इसलिए उन्हें सम्मान से देखा जाता था और अब सम्मानित व्यक्ति होने के बाद उन्हें सड़क पर खड़े होकर नारे लगाने और आंदोलन करने में शर्म आनी शुरू हो गई। बिना कर्मचारियों के आंदोलन की शक्ति के जब यूनियन प्रबंधकों से बात करने जाती है तो वह ज्यादा कुछ पाने की स्थिति में नहीं होती। उसे कई तरह के कमजोर समझौते करने पड़ते हैं।
In banking transfer is a big issue. The managements were using it both as a punishment and as an award. The groupism was increasing in the union. That's why Apoorv had started with drawing from the union activities. Liberalization was also showing impact on the society even though at that time it had just entered. Even then a lot of imported smart items were available in the market. Liberalisation had decreased jobs in some sectors on one side but has increased jobs in other sectors on the other side. In the era of liberalization qualified employees were getting handsome salaries. With the end of Licence Raj improvement was shown by the Indian industries also. With the western dresses and western daily consumable items, the mindset of Indian were also changing. It is but natural. Indians have started following the Western lifestyle. It is a natural human tendency. The business of Sandhi was also flourishing. She has started getting orders from Europe and other Western countries. But with this her night parties were also becoming longer and longer. Both Apoorv and Shandily were noticing this. Apoorva could not decide up to what extent he should avoid all these things. Shandily had started spending his more and more time with friends. He was supposed to enter the college life this year only. That's why Apoorv was not in favour of disturbing him. Apoorv had started considering the solution for him self which he had advised to the the Nisha of taking a transfer to some other City. In the meantime Shandily got admission in IIT Kharagpur and got 80% marks in his 12th examination. now only Sandhi and Apoorv were left in home. while Sandi kept her busy in the business, just to pass his time Apoorv started taking interest in the union activities again.
उधर बैंक में स्थानांतरण एक बहुत बड़ी समस्या है, जिसका प्रबंधक जमकर फायदा उठा रहे है। ट्रांसफर को लालच और दंड दोनों तरह का प्रबंधक इस्तेमाल करते है। यूनियन में गुटबाजी बढ़ती जा रही है। इसीलिए अपूर्व ने अपने आप को थोड़ा पीछे हटाना शुरू कर दिया। उदारीकरण का प्रभाव भी समाज पर दिखना शुरू हो गया। तब हालांकि यह उदारीकरण का पहला दौर था मगर फिर भी विदेशी समान भारत की मार्केट में आना शुरू हो गया था। उदारीकरण ने जहां कुछ क्षेत्रों में नौकरियां कम की थी दूसरी तरफ नौकरियां बढ़ाई भी थी। नई नौकरियों में पैसा भी अच्छा मिल रहा था। लाइसेंस राज कमजोर होने से भारतीय उद्योग में भी तरक्की दिखाई देने लगी थी। पश्चिमी लिबास और विदेशी चीजों के साथ विदेशी संस्कारों की नकल भारत में आने शुरू हो गई थी। यह सहज मानवीय प्रतिक्रिया है। इन दिनों संधि का व्यापार भी उन्नति करने लगा था। अब उसकी देर रात की पार्टियां ज्यादा और लंबी होने लगी थी। अपूर्व और शांडिल्य दोनों ही इसे महसूस करने लगे थे और शांडिल्य ने तो अपना ज्यादा समय दोस्तों के साथ बताना शुरू कर दिया था। मगर अपूर्व समझ नहीं पा रहा था कि कहां तक यह सब अनदेखा करें। इसी वर्ष शांडिल्य कॉलेज जाने वाला था। इसलिए अपूर्व नहीं चाहता कि वह किसी तरह के तनाव में रहे। कभी-कभी तो सोचता था कि जो तरीका उसने निशा को बताया क्या उसको भी इसे इस्तेमाल करना चाहिए और अपनी कहीं बदली करवा ले । इसी उधेड़बुन में जून आ गया और शांडिल्य का रिजल्ट आ गया। उसके 80% नंबर आए तथा आईआईटी खड़कपुर में भी उसका नंबर आ गया। अगस्त में वह हॉस्टल चला गया तथा घर में संधि और अपूर्व अकेले रह गए। संधि अपनी दुनिया में मस्त थी। अपूर्व ने भी तब फिर से अपने आप को यूनियन के कामों में व्यस्त का लियाl
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Apoorv remembered in September 1992 the atmospheric temperature was coming down but the political temperature was getting up. After the Rath Yatra by Shri Lal Krishna Advani BJP had got the recognition everywhere in India. BJP Wanted to encash this reputation. They called a 'Dharm Sansad' (the religious parliament) in Delhi on 30th October 1992. In which the issue of Ram Mandir was to be discussed. On 30th and 31st October 1992 more than 5000 Hindu saints reached Delhi to attend this Dharam Sansad. Officially BJP was not in picture and it was a purely religious program, but in fact from back backdoor all the arrangements were done and look after by RSS, Vishva Hindu Parishad and Bhartiya Janata Party. In this program eighth member of parliament from BJP were there. Out of them 6 were from RSS background. It was guessed on very first day that in this Dharm Sansad date of 'Kar Seva' will be announced. The conclave continued for 2 days and one after another speaker said a lot against Prime Minister Mr PV Narasimha Rao.
अपूर्व को याद है कि इस सितम्बर 1992 के महीने में आसमान की गर्मी कम होना शुरू हो गई मगर राजनीतिक तापमान बढ़ना शुरू हो गया। श्री लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा से भाजपा की पहचान पूरे देश में बन गई थी। भाजपा इस मुद्दे को पूरी तरह भुनाना चाहती थी। उसके एक संगठन विश्व हिंदू परिषद ने इस मुद्दे को उठाना शुरू कर दिया। 30 अक्टूबर 1992 को दिल्ली में धर्म संसद बुलाई गई, जिसमें राम मंदिर का मुद्दा उठाया जाना था। 30 और 31 अक्टूबर 1992 को धर्म संसद में करीब 5000 से ज्यादा साधु संत दिल्ली आए। खास बात यह थी की अनाधिकारिक रूप से खेल की बागडोर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद तथा भाजपा के हाथ में थी। मगर आधिकारिक रूप से भाजपा ने इस प्रोग्राम से दूरी बना रखी थी। प्रोग्राम में 8 सांसद भाजपा के मौजूद थे। जिनमें से 6 सांसद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित थे। सारा प्रोग्राम संत समाज के नेतृत्व में था। हालांकि पहले दिन ही यह स्पष्ट हो गया था कि कार सेवा की तारीख की घोषणा हो जाएगी, मगर सम्मेलन 2 दिन चला। विभिन्न वक्ता लगातार प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के विरोध में माहौल बनाते रहे ।
On the other hand differences were cropped up between UP Chief Minister Mr. Kalyan Singh and VHP. Mr Kalyan Singh was interested to give some more time to the the Central Government. But VHP was interested to decide the the 'Kar Seva' immediately. At last the decision was taken by RSS and the Ram Janam Bhoomi Nyas Mandal and Kar Seva was declared to be started from 6 December 1992. In fact Mr Kalyan Singh has acquired 2.77 acre of land outside the the disputed land. But there was a case pending in the Allahabad High Court on this land. Mr Kalyan Singh was interested let the decision on this be announced then only Kar Seva may be undertaken. The hearing was continued on the case was going on day to day basis. Mr Kalyan Singh was of the opinion that if the court give the acquired land to the Ram Janmabhoomi Nyas then it is well and good and the Kar Seva would be done without any interruption. But in case the court give any decision against the acquisition in that case Ram Janam Bhumi Nyas had already purchased so many lands privately out of disputed land and Kar Seva could be done on those. He was purposing that high structures could be made on these purchased land. Then central government will be under pressure to handover the the disputed land to Shri Ram Janmabhoomi Nyas. But with the announcement of date of Kar Sewa his calculations failed and chances of any negotiated settlement diminished. The High Court reserved its judgement. Which was again a setback to the the Mr. Kalyan Singh line of thought.
उधर मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह और विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व के बीच खींचतान भी चल रही थी। कल्याण सिंह चाहते थे कि केंद्र सरकार को कुछ और समय दिया जाए। दूसरी तरफ विश्व हिंदू परिषद कार सेवा तुरन्त करना चाहती थी। आखिर में फैसला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और श्री राम जन्मभूमि निदेशक मंडल के बीच हुआ और 6 दिसंबर 1992 की तिथि तय की गई। असल में श्री कल्याण सिंह की उत्तर प्रदेश सरकार ने विवादित जमीन के बाहर का 2.77 एकड़ जमीन का अधिग्रहण पहले से ही कर रखा था। उसको लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक केस चल रहा था। उसकी सुनवाई प्रतिदिन की तर्ज पर हो रही थी। कल्याण सिंह चाह रहे थे कि उसके फैसले के बाद ही कारसेवा कराई जाए। अगर तो यह फैसले में अधिग्रहण को कानूनी मान्यता मिल जाती है तो फिर तो कार सेवा में कोई दिक्कत ही नहीं है, क्योंकि यह विवादित क्षेत्र में नहीं है। और इस पर कोई कानूनी अड़चन भी नहीं है। अगर यह अधिग्रहण अदालत रद्द कर देती है तो भी कई क्षेत्र के कागज पहले ही श्री राम जन्म भूमि न्यास ने लोगों से अपने लिए ले लिए थे। अतः उन प्राइवेट टुकड़ों पर कार सेवा शुरू करके विवादित भूमि के आसपास भवन निर्माण कर दिया जाऐ तो विवादित क्षेत्र को न्यास को सौंपने का दबाव केंद्र पर बढ़ जाता। मगर तारीख की घोषणा से श्री कल्याण सिंह की घोषित योजना पीछे रह गई। वार्ता के द्वारा समझौते की आशा क्षीण हो गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी सुनवाई पूरी करके फैसला बाद में सुनाने की घोषणा कर दी।
Perhaps the announcement of the date of Kar Seva had hardened the Stand of Allahabad High Court. On the other side with in Congress the opponents of Mr P V Narasimha Rao were pressurising him to dismiss the Uttar Pradesh government and take the charge of disputed land in its own hand. But Prime Minister Mr. P V Narasimha Rao knew that in case he dismissed Uttar Pradesh government, Mr Kalyan Singh would be projected as a hero who sacrificed his Government for the cause of Shri Ram Temple. So, the Central Government went to the Supreme Court and filed a case that Supreme Court may apoint an receiver who would take care of the disputed land. Because with the announcement of Kar Seva there are chances that the law and order condition of the area may be in danger. The Supreme Court issued notice to the Uttar Pradesh Government for giving an affidavit to protect the structure on the disputed land. Uttar Pradesh Government first avoid to give any affidavit and said that law and Order is a state matter and Centre Government shall not intervene. But the Supreme Court took a very strong stand and asked Uttar Pradesh Government either you give the affidavit or Supreme Court well appoint a receiver. Then only the State Government gave an affidavit saying that nobody will be allowed to change the status of the disputed land and no temporary or permanent structure will be allowed on disputed land. Even then Supreme Court asked Allahabad High Court to appoint an observer. Allahabad High Court appointed an officer of district court as observer.
कार सेवा की घोषणा ने शायद इलाहाबाद हाई कोर्ट के रुख में कड़ापन ला दिया। उधर कांग्रेस पार्टी में जो श्री पी वी नरसिम्हा राव विरोधी गुट था वह सरकार पर दबाव बना रहा था कि उत्तर प्रदेश सरकार को बर्खास्त कर विवादित भूमि का कंट्रोल अपने पास ले ले। उस ग्रुप का नेतृत्व श्री फोतेदार कर रहे बताया जाता था। श्री नरसिम्हा राव जानते थे कि अगर राज्य सरकार को बर्खास्त किया, तो श्री कल्याण सिंह को अपनी सरकार का बलिदान करने वाला हीरो बना कर पेश कर दिया जाएगा। आखिर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई की कार सेवा होने से कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। तथा विवादित ढांचे को कोई नुकसान न पहुंचे इसके लिए सुप्रीम कोर्ट अपना एक रिसीवर नियुक्त कर दे। कल्याण सिंह जानते थे कि अगर रिसीवर नियुक्त हो गया तो कंट्रोल सारा सुप्रीम कोर्ट के पास चला जाएगा। अतः राज्य सरकार ने कोर्ट में कहा कि कानून व्यवस्था राज्य का मामला है अतः केंद्र सरकार को इसमें नहीं आना चाहिए। कोर्ट ने राज्य सरकार को हलफनामा दाखिल करने को कहा। पहले तो कल्याण सिंह की राज्य सरकार ने गोलमोल सा जवाब दिया। मगर सुप्रीम कोर्ट के सख्ती दिखाने पर और यह कहने पर कि अगर राज्य सरकार ने स्पष्ट रूप से हलफनामा नहीं दिया तो रिसीवर लगा दिया जाएगा। आखिर में कल्याण सिंह की उत्तर प्रदेश सरकार ने यह हलफनामा दिया कि कार सेवकों द्वारा कोर्ट में लंबित केस वाली भूमि पर किसी भी स्थाई या अस्थाई निर्माण को नहीं करने दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने उस हलफनामे को मान लिया। मगर इलाहाबाद हाईकोर्ट को आदेश दिया कि एक पर्यवेक्षक लगाया जाए जो इस बात की सुनिश्चित करें कि अदालत के किसी निर्देश का उल्लंघन नहीं हुआ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जिला कोर्ट के अधिकारी को नियुक्त कर दिया।
As 6th December was approaching the political atmosphere of Ayodhya was getting charged. There were rumours every where. Some people were saying that RSS and Prime Minister had reached an agreement and Kar, Seva will be Symbolic. Some were saying that Mr. Kalyaan Singh will resign on 5th December and join the Kar Seva. The Kar Sevak started reaching Ayodhya from 2-3 December. After seeing their number and mood, residents especially minorities started moving out of Ayodhya. The population of Ayodhya at that time was about 75000 but more than double of that had reached there by 4th December. There were some minor incidents of violence reported on 3and 4 th December. On 5th December there was a rumour that Kar Sevak had taken training for demolishing the Babri Masjid.
मगर जैसे जैसे 6 दिसंबर नजदीक आ रहा था अयोध्या की हवा में गर्माहट बढ़ती जा रही थी। तरह तरह की अफवाहों का बाजार गर्म था। कुछ कह रहे थे कि आर एस एस की प्रधान मंत्री श्री पी वी नरसिम्हा राव से बात हो गई है। अब कारसेवा सिर्फ प्रतीकात्मक होगी। कुछ कह रहे थे कि 5 दिसंबर 1992 की रात को कल्याण सिंह इस्तीफा दे देंगे और कार सेवा में शामिल हो जाएंगे। 2 और 3 दिसंबर को कार सेवकों का आगमन शुरू हो गया। कारसेवकों की बढ़ती संख्या को देखते अयोध्या वासी खास तौर पर अल्पसंख्यक घर छोड़कर जाने लगे। अयोध्या की अपनी जनसंख्या 75000 के करीब है और उससे दुगनी संख्या कारसेवक पहुंच चुके थे। 3 और 4 दिसंबर को कई जगह तोड़फोड़ और मारपीट की भी इक्का-दुक्का घटनाएं हुई। प्रशासन की चिंता बढ़ रही थी। अफवाह यह भी थी की 5 दिसंबर को कारसेवकों ने मस्जिद गिराने की पूरी ट्रेनिंग भी ली थी।
At last 6 December 1992 approached. There was a little tension through out the country. Ayodhya was over crowded with Kar Sevak. Taking note of the over crowded Ayodhya a large number of Kar Sevak were stopped in the way. It was a Sunday. All the family members of Apoorv were sitting at home and were watching TV. Though VHP had announced that there will be a symbolic Kar Seva only but still every body was having curiosity. On TV they were giving the details of Ayodhya. Near Ram Chbootra out of the disputed land they had made a stage in shape of a 'Yugh Sthal'. Only VVIP's were allowed to go there. It was surrounded by the volunteers of VHP from all the sides. In the outer layer they were further surrounded by Police. In the details given after ward it was told that at about 11.00 a. m. when Mr. Lal Krishan Advani and Mr. Murli Manohar Joshi came there at that time a large number of Kar Sevak tried to enter in to the closed enclosure. Resulting in to the clashes between Volunteers and Kar Sevak. The attention of the police was diverted towards them. In between thousands of Kar Sevak moved towards the disputed structures. They arranged some ropes and 'Kudals' etc. from construction sites in Ayodhya. First of all a person reached the top of a Gumbad of the disputed structure by riding on a nearby tree with the help of a rope. Looking him on the top some other also reached on the top having Kudals and other construction instruments with them. Then every thing went out of hand and at 1.00 p. m the first Gumbad was demolished.
आखिर 6 दिसंबर 1992 भी आ गया पूरे देश में एक अजीब सा तनाव था। पूरा अयोध्या कारसेवकों से भरा पड़ा था। बढ़ती भीड़ को देखकर कई कारसेवकों को रास्ते में ही अन्य शहरों में रोक दिया गया था। रविवार का दिन था अपूर्व के घर में सब लोग इकठ्ठे बैठे थे। हालांकि विश्व हिंदू परिषद के नेताओं ने यह घोषणा की थी कि कारसेवक सिर्फ संकेतिक कार सेवा करेंगे। श्री राम चबूतरे के पास ही एक यज्ञ स्थल की तरह की जगह पर मंच विवादित क्षेत्र से बाहर बनाया गया था। वहां पर सिर्फ विशिष्ट लोगों को जाने की अनुमति थी। इस जगह को चारों तरफ से विश्व हिंदू परिषद के स्वयंसेवकों ने घेर रखा था। उनके चारों तरफ पुलिस का घेरा था। कहा जाता है कि 11:00 बजे के करीब जब श्री लाल कृष्ण आडवाणी और डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी वहां पर आए तो उनके साथ काफी कारसेवक वहां घुसने लगे। तथा ऐसे में स्वयंसेवकों तथा
कारसेवकों में झड़प हो गई। पुलिस फोर्स का ध्यान उस तरफ लग गया। पीछे से हजारों कारसेवक विवादित स्थल की तरफ बढ़ने लगे। कुछ दिन पहले अयोध्या नगर मैं निर्माण कार्य के लिए जो रस्सी कुदाले इत्यादि समान लाया गया था उसका कारसेवक इस्तेमाल करने लगे। एक मोटा सा रस्सा एक पेड़ पर लटका कर पहले कुछ कारसेवक गुंबद के ऊपर चढ़ गए। उन्हें देखकर बाकी हजूम में भी जोश में भर गया और शीघ्र ही हालात पुलिस की काबू से बाहर हो गए। तथा 1:00 बजे के करीब पहला गुंबद गिरा दिया गया।
All telephone poles and wires were smashed and road from Ram Janam Bhoomi to National Highways was jammed by the Kar Sevaks. So that no aid for police could reach from Faizabad. As per some news Mr. Kalyaan Singh was ready to send his resignation immediately after demolition of 1st tomb. But Mr. Lal Krishan Advani asked him to wait till evening. Since once he resign then there will be President Rule in the state and Law and order will be under Central Government. All the three tombs were demolished by 5 O'clock in the evening. Though all leaders including Sh. Lal Krishan Advani were regularly making appeals to the people to stay away from the disputed structures but no body listened to them. Though some people were saying these appeals as an eye wash. Some Press Reporters were also attacked. Mob snatched their Cameras and removed reels from it. Some Cameras were broken also by mob. In the evening Mr. Kalyaan Singh send his resignation. The public in the meantime constructed a temporary Shri Ram Temple and started worshipping there. In the morning Central Forces took over the possession.
सारी टेलीफोन के खंभे और तारे तोड़ दी गई। बाहर के राष्ट्रीय मार्ग से लेकर जन्मभूमि तक की सड़क पर कारसेवकों ने सारी सड़क जाम कर दी, ताकि फैजाबाद से कोई सहायता पुलिस को न मिल सके। कहा जाता है कि श्री कल्याण सिंह पहले गुंबद के गिरने के साथ ही अपना इस्तीफा भेजने लगे थे l मगर श्री लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें शाम तक रुकने के लिए कहा। क्योंकि केंद्रीय शासन लगते ही सारी कानून व्यवस्था केंद्र के पास चली जाती। शाम 5:00 बजे के करीब तीनों गुंबद गिर गए। हालांकि इस दौरान श्री लालकृष्ण आडवाणी तथा अन्य नेताओं ने लगातार लोगों से अपील की थी कि वह गुम्बन्द न तोड़े। मगर इस बारे में लोगों का कहना है कि यह सब दिखावे के लिए किया गया था। प्रेस फोटोग्राफर पर हमले किए गए और उनके कैमरे छीनकर सारे प्रमाण खत्म कर दिए गए। कईयों के तो कैमरे भी तोड़ दिए गए। शाम होते-होते श्री कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया। इस दौरान कारसेवकों ने अस्थाई मंदिर बनाकर उसमें श्री रामलला को स्थापित कर दिया। सुबह आकर केंद्रीय फोर्स ने उस जगह को और मंदिर को अपने कब्जे में ले लिया।
Apoorv remembered that when all this was going on in Ayodhya at the same time the Delhi also witnessed hectic political activities here. It was strange that when all this was going on in Aayodhya but there was no reaction available from PM Secretariat. It was told that PM was busy in Pooja. Some Congress leaders blamed in private that they tried to contact PM on telephone but he was not available. The opponents of Mr. Narsimha Rao within from Congress went to the President also and demanded his interference. After demolition the meeting of the Cabinet was called in the evening. There was a hot discussion in the meeting. The news of riots started coming from some states. The Governments of Uttar pradesh, Himacal Pradesh, Madhy Pradesh and Rajasthan were dismissed. Within next 48 hrs the Kar Sevak were sent back to their home town by buses and special trains. From 7th December more news of riots started coming from other areas also. On one side hardliner Hindu Organizations were celebrating this as a 'Shory Divas'(Bravery day) on the other hand Muslim organizations were calling it a black day. Prime Minister also condemned this. Every party was trying to get political benefits out of it.
अपूर्व को याद है कि जब अयोध्या में यह सब चल रहा था, तो दिल्ली में भी राजनीतिक सरगर्मियां देखने को मिली थी। हैरानी की बात थी कि जब अयोध्या में या घटनाक्रम चल रहा था तब प्रधानमंत्री कार्यालय से कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही थी। कहते तो यह भी थे कि श्री नरसिम्हा राव उस दिन एक पूजा में व्यस्त थे। उनकी ही पार्टी के कुछ नेता यह कहते सुने गए कि उनके बार-बार फोन करने पर भी श्री नरसिम्हा राव फोन पर नहीं आए थे। श्री नरसिम्हा राव विरोधी खेमे के नेताओ ने राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा के पास भी जाकर उनको हस्तक्षेप की मांग की।अखिर तीनों गुंबद गिरने के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हुई और उसमें आपस में काफी वाद विवाद हुआ। इस दौरान कई राज्यों में भी बाबरी मस्जिद गिरने के बाद दंगे भड़कने शुरू हो गए थे। केंद्र ने उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकारों को बर्खास्त कर दिया था। स्पेशल ट्रेन और बसे चलाकर कारसेवकों को वापस भेजा गया। 7 दिसंबर को दंगे और तीव्र हो गए। तब अपूर्व और संधि लगातार खड़कपुर में शांडिल्य से संपर्क बनाए हुए थे। जहां विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना जैसे हिंदूवादी संगठन 6 दिसंबर को शौर्य दिवस बना रहे थे, वही मुस्लिम संगठन इसे काला दिन बता रहे थे। प्रधानमंत्री ने भी इसकी कड़ी निंदा की। सब इस घटना में अपनी अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे थे।
Some political analysts were saying that Mr. P. V. Narsimha Rao allowed to let it happened. There argument was that by demolition, the issue of Babri Masjid was sliped out of hands of BJP for ever. BJP could no more use this issue in future for polarization of votes. But no body could judged that newly formed Samajwadi Party would get away with the Muslim votes and Harijan votes will turn towards Bhaujan Samaj Party. These both vote banks were supposed to be the core vote banks of Congress. The BJP also got a set back as their dreams of polarizing all Hindu votes could not be full filled due to BSP. The whole country was burning due to riots. Mumbai was worst hit. About 2000 people lost their lives in these riots. Sandhi's business also get a set back because it became difficult for her to get artisans and labourers. People were start hesitating in giving credits to each other. On 16th December Librahan Commission was constituted to enquire the Babri Masjid Demolition. The Commission was given 3 months time to give it's report. But this incident had created a gap in the society and news of riots were randomly coming. Now Sandhi used to stay at home and they both use to sit together in the evening. Now they were discussing on the issues while watching the TV. In, Christmas holidays Shandily also came home for vacations. His friends started coming to see him. So there was a hustle and bustle in the home. This was perfect home which Apoorv dreamt off.
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह कहना था कि श्री नरसिम्हा राव ने यह सब होने दिया l क्योंकि वह चाहते थे कि यह मुद्दा हमेशा के लिए खत्म हो और भाजपा के हाथ से यह मुद्दा हमेशा के लिए निकल जाए। मगर उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि अक्टूबर 1992 में उत्तर प्रदेश में बनी समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोट को अपने पक्ष में कर लेंगी और कांग्रेस को उसका कोई फायदा नहीं मिलेगा। उधर बहुजन समाज पार्टी दलितों की अगुआ बन चुकी थी। यह दोनों समुदाय जो कांग्रेस के पक्के समर्थक माने जाते थे वह समुदाय अब कांग्रेस से छिटकते जा रहे थे। भाजपा को भी इन दोनों दलों के उदय से झटका लगा था। पूरा देश इन दंगों में झुलसने लगा। मुंबई में तो इन दंगों का बहुत असर हुआ । पूरे देश में करीब 2000 लोगों की जान चली गई। संधि के व्यापार पर भी दंगों का बहुत असर पड़ा था। अच्छे कारीगर मिलने मुश्किल हो गए थे। दंगों से घबराकर मजदूर गांव में पलायन करने लगे थे। व्यापार में एक दूसरे पर भरोसा करके कैरिडट देने से लोग घबराने लगे थे। 16 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच करने के लिए लिब्राहन आयोग की स्थापना हुई और उसे 3 महीने में अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया। मगर समाज में एक दरार पड़ चुकी थी। दंगे अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए थे। रह-रहकर घटनाओं की खबर आती रहती थी। संधि ज्यादातर अब घर में ही रहने लगी थी। दोनों शाम को बैठ कर टीवी भी देखने लगे थे और विभिन्न मुद्दों पर बात भी करते थे। किसमिस की छुट्टियों में शांडिल्य भी घर वापस आ गया। उसके दोस्तों के आने जाने से घर में रौनक हो गई और अपूर्व ऐसी ही जिंदगी की कल्पना करता था।
Apoorv's life was limping back to normalcy but in the meantime on 12 th March 1993 there were serial blasts in Mumbai. In afternoon at 1.30 p.m.there was a blast near Stock Exchange and in next few hours the whole of Mumbai was shocked by serial blasts. Javeri Bazar, Centure hotel, Air India office etc were the target spots. These blasts were done by keeping explosives in Cars and scooters etc. The whole country was stunned. In police investigation it was found that Dawood Ibrahim and Tigor Memon were responsible for that. Police got this information from a Car full of explosives and AK47 rifles found near BMC office. This car was registered in the name of a female member of Yaakoob and Tigor Memon family. That Car was left behind by the extremists after they ran away from there. There target was BMC office. It was also hearld that the whole under world after Babri Masjid demolition was divided in two groups. One of Dawood Ibrahim, Tigor Memon, Abu Salem and other of Chota Rajan, Mohan and Sadhu. 12 explosions took place on that day in which 257 people died and 719 were injured. Though apparently the life in Mumbai seems to be returned back to normalcy but still tension was there in every one's mind . It also impacted adversely on the Sandhi's Business because Sandhi was having most of her clients in Dubai. Both Dawood Ibrahim and Tigor Memon were in Dubai. The relationship of India and Dubai were adversely affected.
अपूर्व की जिंदगी अब आहिस्ता आहिस्ता वापस पटरी पर आने लगी l तभी 12 मार्च 1993 को मुंबई में कार धमाके हो गए। दोपहर 1:30 बजे के करीब स्टॉक एक्सचेंज में धमाका हुआ। उसके बाद थोड़े-थोड़े अंतराल में पूरी मुंबई धमाको से दहल गई। जिनमें जावेरी बाजार, सेंटूर होटल तथा एयर इंडिया ऑफिस इत्यादि थे। यह धमाके कार और स्कूटरो में बम रखकर कराए गए थे। पूरा देश सकते में रह गया। पुलिस की जांच से पता चला कि इसका जिम्मेदार दाऊद और टाइगर मेमन थे। असल में पुलिस को सुराग मिला एक लावारिस कार से, जो बम और AK-56 राइफ्लो से भरी हुई थी और वह टाइगर और याकूब मेमन के घर के किसी महिला के नाम पर रजिस्टर थी। उसका निशाना बीएमसी का ऑफिस था। मगर आतंकवादी उसे छोड़कर भाग गए। उस वक्त लोगो का कहना था कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से ही पूरा अंडरवर्ल्ड दो हिस्से में बट गया था। एक ग्रुप दाऊद इब्राहिम, अबू सलेम और टाइगर मेमन इत्यादि का था तो दूसरा छोटे राजन, साधु, मोहन और उसके साथियों का था। उस दिन 12 धमाके हुए थे तथा 257 लोगों की मौत हुई और 719 घायल हुए थे। हालांकि दो-तीन दिन में ही मुंबई में जीवन सामान्य जैसा लगने लगा था। मगर हर एक के दिमाग पर एक अजीब सा तनाव था। संधि के व्यापार पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा था। क्योंकि उसका ज्यादातर व्यापार दुबई और खाड़ी के देशों में था। कहा जा रहा था कि दाऊद और मेंमन दोनों ही दुबई में थे। भारत के साथ उनके संबंध तनावपूर्ण हो गए।
Sandhi was now trying to find out some new clients in USA and Europe. But it was not an easy job as most of the US market was captured by the China and it was very difficult to compete with them. The export policy of China was such that Indian companies could not compete them due to our tax structure. Now Indian companies were facing the competition in the International markets. To expand her business in European Market Sandhi was forced to visit the European countries. It was not easy for her to adjust in their culture. In the age when Sandhi was a mother of a young son, in those countries people start thinking of getting married. But any way she was trying hard to establish her there. At last Sandhi start getting some clients there.
संधि अब यूरोप और अमेरिका में अपने सामान के लिए खरीदार ढूंढने लगी थी। मगर शायद वह इतना आसान नहीं था। अमेरिका की मार्केट का तो एक बड़ा हिस्सा चीन के पास था। और चीन सरकार के निर्यात नीति ऐसी थी कि जिस रेट पर चीन समान बेचता था उस रेट पर भारत मे टैक्सों के कारण नहीं भेजा जा सकता था। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के स्वरूप अब सामने आने लगे थे। संधि को अब यूरोपीय देशों की यात्रा करनी पड़ी। वहां के वातावरण में अपने को ढालना इतना आसान नहीं था। वहां का खुलापन आकर्षित तो करता था मगर उस में घुल मिल जाना इतना आसान नहीं था। वह भी उम्र के इस दौर में जब वो एक जवान बेटे की मां थी। जबकि यूरोप में उसकी उम्र के लोग तो अभी शादी करने के बारे में सोचना शुरु करते थे। खैर सन्धि पूरी कोशिश कर रही थी। कुछ यूरोपियन देशों ने मिलकर यूरोपियन कम्युनिटी बना ली थी जिसकी वजह से वहां पर फ्री ट्रेड हो गया था। उससे कुछ आसानी हो गई थी और सन्धि कुछ खरीदार मिलने शुरू हो गए।
All of a sudden Mr. Hanif and Mr. Samir the Partners of Magnum Cassettes who were considered to be close to Dawood Ibrahim and Tigor Memon in interrogation indicated that Mr. Sanjay Dutt was also involved in keeping the AK 47 and other explosives. They disclosed that they and Mr. Abu Salem kept explosives in custody of Mr. Sanjay Dutt. On 19th April 1994 when Sanjay Dutt came back from Mauritius he was arrested on Mumbai airport. On 26 th April and 28 th April he confessed that they gifted an A. K. 47 rifle to him and he kept it for the safety of his family. It was a great shock for his father Mr. Sunil Dutt and Congress. Mr. Sunil Dutt was already under attack from his opponents that in the riots after Babri Masjid he had sent most of the relief materials to the minority dominated areas. Now this incident had further tarnished his image. Now he was running to everyone for release of Mr. Sanjay Dutt. All such incidents were creating negative impact on the business community.
तभी बम धमाकों में श्री संजय दत्त का नाम भी उछलने लगा था। श्री हनीफ और समीर की जोड़ी जिनकी मैग्नम नाम से एक वीडियो कैसेट की कंपनी थी, वह दाऊद और अनीश के नजदीकी माने जाते थे। जब धमाकों के बाद उनसे पूछताछ की गई तो उन्होंने श्री संजय दत्त का भी नाम ले दिया। उनका कहना था कि उन्होंने और श्री अबू सलेम ने श्री संजय दत्त के पास एक हथियारों की के खेप रखी थी। 19 अप्रैल 1994 को जब श्री संजय दत्त मारीशस से मुंबई उतरे तो उन्हें टाडा में गिरफ्तार कर लिया गया। 26 और 28 अप्रैल को उन्होंने इकबालिया बयान दे दिया और कहा कि उन्होंने एक ही AK 56 सिर्फ अपने परिवार की सुरक्षा के लिए रखी थी। जो उसे इन लोगों ने सौगात के रूप में दी थी। कांग्रेस और श्री सुनील दत्त के लिए यह बहुत बड़ा झटका था। पहले ही श्री सुनील दत्त पर यह आरोप लग रहे थे कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में सारी राहत सामग्री वह मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भेज रहे थे। श्री सुनील दत्त की सारी उम्र की सुविख्याति मिट्टी में मिल चुकी थी। वह अपने पुत्र की रिहाई के लिए कोशिश कर रहे थे। इस तरह के सामाजिक तनाव का प्रभाव बिजनेस कमुनिटी पर भी पड़ रहा था।
BJP strategically thought at that time that they can take the the benefit of polarization due to the Babri Masjid demolition and Mumbai riots. Hence they decided along with other opposition parties to serve a 'No Confidence Motion against Mr PV Narsimha Rao government. As there was a political uncertainty in the atmosphere of country so it created a negative impact on the buisness community also. Because whenever there is a danger to the existing government the business sector become volatile. As nobody knows who will be in the power next time and what would be the policies, specially in export and import. Sandhi was also worried about these happenings, in the meantime her father passed away. Now she get confused and found herself under great stress. She requested Apoorv to join her in business and help her. But Apoorv was hesitating because in the life of Sandhi's father he never joined business because of his principles. If after Sandi's father's death he join her in business then it will give a wrong message about him. It would be thought by others as he was pretending to not join the business because of his principles and as soon as he got a chance he joined it. Ultimately it was decided that Apoor will take a long leave from the bank and join the business. Some arrangements will be made afterwards according to sitution.
तब के हालात में भाजपा को लग रहा था कि उस वक्त केंद्र में श्री पी वी नरसिम्हा राव की सरकार को गिरा दें तो उसे बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद दंगो तथा मुंबई धमाकों की वजह से होने वाले ध्रुवीकरण का फायदा मिल सकता है। अतः उन्होंने विरोधी पार्टियों से बात करके सरकार को अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे दिया। सब जगह हलचल मच गई । जब भी कभी राजनीतिक अस्थिरता होती है तो उसका सीधा असर व्यापार पर भी पड़ता है। और अगर सरकार बदलती है तो उसका आयात निर्यात क्या रुख होता है इसकी अनिश्चिता हो जाती है। संधि भी चिंतित हो गई थी। इसी दौरान उसके पिता की मृत्यु हो गई। वह एकदम घबरा गई उसने अपूर्व को आग्रह किया कि वह नौकरी छोड़ कर उसके साथ बिजनेस में आ जाए। मगर अपूर्व को लग रहा था कि उसके ससुर के जीवित रहते अपने आत्मसम्मान की वजह से वह उनके बिजनेस में नहीं गया। मगर मृत्यु के बाद अगर एकदम चला जाता है, तो उसके प्रति यह धारणा बनेगी कि उसका पहले बिजनेसमैन में न जाना उसके आदर्श नहीं बल्कि दिखावा था। काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने यह फैसला लिया कि फिलहाल वह लंबी छुट्टी लेकर व्यापार में संधि की सहायता करेगा। और बाद में कोई इंतजाम किया जाएगा।
Now Apoorv and Sandhi both were working together in the business. Then 26 July 1992 approached. Everybody was curios that how Narsimha Rao government will manage for the majority when they were having only 259 members of Parliament. This was the the big challenge for Mr P V Narasimha Rao and his group. Mr Buta Singh and others other supporter of Sh. P V Narasimha Rao started approaching small parties to extend their support to the Government. On the other side there was a rumour that in case of Mr P V Narsimha Rao could not prove his majority in the parliament then a big group from Congress will break away and extend their support to the the BJP plus some other parties to form a Government in the Centre. At last the polling took place and everybody was surprised when Jharkhand Mukti Morcha supported the government and Mr P V Narasimha Rao was succeeded in saving his government. Immediately allegation and counter allegation were levelled against each other. The opposition parties were alleging that Jharkhand Mukti Morcha was heavily bribed to vote in favour of Government. In the meantime a stock broker Mr Harshad Mehta levelled charges against Mr. PV Narasimha Rao that he had given him 1 crore. Mr Harshal Mehta himself was an accuse of stock exchange Scam of about 4000 crores.
अब अपूर्व और संधि दोनों ही व्यापार में शामिल होकर काम करने लगे। तभी 26 जुलाई 1992 का दिन आया। सभी की नजर संसद पर थी l कांग्रेस और उसके सहयोगियों की संख्या 259 थी किसी को समझ नहीं आ रहा था कि इन अतिरिक्त सांसदों का जुगाड़ कांग्रेस कहां से करेगी। श्री पीवी नरसिम्हा राव की राजनीतिक अनुभव की परीक्षा थी। सरदार बूटा सिंह इत्यादि श्री नरसिम्हा राव समर्थक कांग्रेसी छोटे-छोटे दलों से संपर्क साध रहे थे। उधर अफवाह थी कि अगर श्री नरसिम्हा राव की सरकार गिर जाती है एक धड़ा कांग्रेस से निकलकर भाजपा का समर्थन कर नई सरकार बनाने की कोशिश करेगा। आखिर मतदान हुआ और झारखंड मुक्ति मोर्चा के चार सांसदों ने श्री शिबू सोरेन के नेतृत्व में श्री नरसिम्हा राव की सरकार को समर्थन दे दिया। अब सरकार सुरक्षित हो गई। मगर तुरंत ही आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया। विरोधी दलों का आरोप था कि श्री शिबू सोरेन और उनके अन्य साथियों को भारी रिश्वत दी गई है। काफी दिनों तक शोर मचता रहा l इसी बीच 1993 मे हर्षद मेहता जो की एक स्टॉक ब्रोकर था उसने प्रधान मंत्री श्री पी वी नरसिम्हा राव पर आरोप लगाया कि उसने उन्हे 1 करोड़ रुपया दिया था l हर्षद मेहता शेयर मार्केट मे एक बड़े घोटाले का आरोपी थाl जिस घोटाले को करीब 4000 करोड़ से ज्यादा का बताया गया था l
Mr. Harshad Mehta had became a Stock Broker in 1984. By 1990 he was a big name in Share Market. He was a Bull trader and he was having a reputation that in whichever share he starts buying that share got bullished. In the meantime foreign investors started entering Indian markets after Globalisation of Indian Markets. Due to this the market was touching it's heights. Mr. Harshad Mehta himself was investing a lot in the market. Then suddenly Ms. Sucheta Dalal a reporter of Times of India exposed the scam of Mr. Harshad Mehta. He took benefits of a loop hole of the banking system. There was a practice between the banks that whenever any bank needed loan for short period they use to take it by pledging it's Government bonds to other bank. But just to avoid transferring bonds physically they used to issue a slip which worked as a 'hundi'. He had taken benefit of this and he got forged slips as he was having influence in two banks one was Bank of Karad and other was Metropolitan Bank. He took a big amount as a loan for 15 days from various banks based on the forged slips. In 15 days he use to earn a handsome return on that amount and returned back the bank loan amount within time. The problem started when the markets started sinking and we was not able to return the loan amount in the prescribed time. In the meantime Ms. Sucheta Dalal exposed him. The allegations he levelled against Prime Minister were not taken care as there was no concrete base behind his allegations. After this scam SEBI was constituted to keep an eye on the Stock Market.
हुआ यह था की हर्षद मेहता 1984 मे स्टॉक मार्केट का ब्रोकर बना l 1990 आते आते वो मार्केट का एक बड़ा नाम हो गया l वो जिस शेयर पर हाथ रखता वो तेज हो जाता l तभी उदारीकरण के चलते विदेशी निवेश भी भारत मे आना शुरू हो गया था l नतीजन मार्केट लगातार बढ़ती जा रही थी l हर्षद मेहता खुद भी मार्केट मे खूब पैसा लगा रहा था l तभी TOI की एक पत्रकार सुश्री सुचेता दलाल ने उसका भंडा फोड़ किया l उसने बैंकिंग प्रणाली की एक कमजोर कड़ी का फ़ायदा उठाया l बैंक कैश की जरूरत पड़ने पर एक दूसरे से सरकारी बॉण्ड गिरवी रखकर कम समय का लोन ले लेते थे l बदले मे एक दूसरे को वो असली बॉन्ड न देकर बल्कि एक पर्ची बनाकर दे देते थे l जो कि आपस मे एक हुंडी की तरह काम करती थी l हर्षद मेहता का दो छोटे बैंको मे बड़ा प्रभाव था बैंक ऑफ कराड और मेट्रोपोलिटन बैंक l उसने जाली पर्चिया बनाकर विभिन्न बैंको से 15 दिन के लिए पैसा उठाया और मार्केट मे लगा दिया l इन 15 दिनो मे वो मुनाफा कमाकर पैसा बैंको को वापिस कर देता था l वो फंसा तब जब मार्केट गिरी और वो बैंको का पैसा समय पर वापिस नही कर पाया l तभी सुश्री सुचेता दलाल ने उसकी पोल खोल दी l उसने प्रधान मन्त्री पर जो आरोप लगाया उसका कोई सबूत न होने की वजह से उस आरोप पर कोई ध्यान नही दिया गया l उसके बाद स्टॉक एक्सचेंज पर कंट्रोल के लिए SEBI का गठन हुआl
On the other side Apoorv was not able to adjust him in the business as he was not a business minded person. Otherwise also he was a trade unionist so he was having pro employees approach. While at that time India was on the Globalization track and every business persons were trying to touch new highs. So many times Sandhi got upset by the Apoorv's decisions. In the mean time they appointed one General Manager Mr. Naresh who was having 15 years experience of this line. Slowly and slowly he started winning the confidence of Sandhi. This was what Apoorv feared. In such an atmosphere Apoorv was feeling suffocated and he told Sandhi that he wants to join his job back. By this time only our economy was not Globalized but our relationship were also getting Globalized. By that time money was dominating every where and relations got the second priority. So the Sandhi did not objected and Apoorv came back to his job and life style for which he was meant for.
उधर अपूर्व अपने आपको बिजनेस में एडजस्ट नहीं कर पा रहा था। उसकी सोच व्यपारी वाली नहीं थी। वह तो वैसे भी यूनियन में रहने की वजह से मौलिक अधिकार, मजदूरों के अधिकार, समाज आदि के बारे में ज्यादा सोचता था। जबकि उस वक्त व्यापारिक वर्ग वक्त का फायदा उठा उदारीकरण के पंखों पर नए नए खुले आकाश में जल्दी से जल्दी नई ऊंचाई पर पहुंचना चाहता था। संधि भी अपूर्व के फैसलों से कई बार असहज हो जाती थी। तभी उन्होंने जनरल मैनेजर के पद पर एक अनुभवी व्यक्ति नरेश को भर्ती किया। वह इस लाइन का 15 साल का अनुभव रखते थे। अब आहिस्ता आहिस्ता संधि का विश्वास नरेश के फैसलों पर ज्यादा बढ़ने लगा। अपूर्व को जिस बात का डर था वही सामने आने लगी। भारत के व्यापारी वर्ग भी अब अन्य पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की तरह सिर्फ लाभ पर ध्यान देंने लगे थे। अब सारे संबंध रिश्ते गौण होने लगे थे और व्यापारिक मुनाफा प्रमुख होने लगा था। उस सारे वातावरण में अपूर्व सिर्फ निराश ही नहीं बल्कि अस्थिर होने लगा था। आखिर उसने संधि से बात की और बताया कि वह वापस अपनी नौकरी पर जाना चाहता है। क्योंकि नरेश तो अब काम संभाल ही रहे हैं। संधि ने भी कोई ज्यादा विरोध नहीं किया और अपूर्व अपनी दुनिया में आ गया जिसके लिए वह बना था।
But this incident the gap between the husband and wife was increased. After coming back to the job first person he thought of was Nisha. He could not called her for months together. He called her. Though she didn't complain him but still some garages were there in her tone for the black out for such a long time. They decided to meet in the evening in same restaurant. When they met Apoorv felt a change in Nisha. Now she was more Confident and more self centered. There was a silence between them for some time. Then Apoorv said "How are you Nisha." Nisha said "As usual". Apoorv said " Are you upset and angry with me." Nisha said "You have not authorized me to get angry with you. What relationship we had so that I may get angry with you." Apoorv said"I remained busy in my business and family affairs so I could not called you." Nisha said "That's why I am saying that it was only me who were telling you every thing of my life. I bothered you by telling my problems. But you never shared anything with me. As you said on that day that I always tried to get fatherly protection from Jivesh but now I say that I am trying to get a fatherly protection from you but not as a father. I want to discuss every thing good or bad with you and I expect you to share every thing of your life with me. You can give any name what ever you want to this relationship." With this tears filled the eyes of Nisha. Apoorv hold her hand and said "In future I will take care".
मगर अब दोनों पति-पत्नी एक दूसरे से कुछ ज्यादा दूर हो गए थे। नौकरी में वापस आकर उसे सबसे पहले निशा की याद आई। कई महीनों से उससे बात नहीं हुई थी। उसे फोन किया तो कहा तो उसने कुछ नहीं मगर इतने समय से कोई सम्पर्क न होने का गिला जरूर था। शायद किसी ने ठीक कहा है
"माना कि तुम्हारे लिए हम नहीं
मगर हमारी भी एक शख्सियत है
इसमें कोई वहम नहीं"।
अगली शाम को वही क्लॉक टावर रेस्टोरेंट में मिलने का प्रोग्राम बना। शाम को जब निशा मिली तो उस में कुछ बदलाव था। पहले की अपेक्षा अपने आप पर ज्यादा ध्यान केंद्रित थी तथा आत्मविश्वास भी बढ़ा हुआ था। दोनों कुछ देर चुप रहे फिर चुप्पी तोड़ते हुए अपूर्व ने कहा "कैसी हो निशा"। निशा कुछ देर चुप रही फिर बोली "वैसी ही जैसी होनी चाहिए"। अपूर्व ने कहा "नाराज हो क्या"। निशा बोली "नाराज होने का हक आपने दिया ही कब।" अपूर्व बोला "असल में व्यापार और घर की उलझनों में कुछ ऐसा फंसा रहा। कि तुम्हें फोन भी नहीं कर पाया।" निशा बोली "तभी तो कह रही हूं कि आपने नाराज होने का हक ही मुझे नहीं दिया। आप हमेशा मेरी समस्या सुनते रहे और सुझाव देते रहे। आपने कभी भी अपनी समस्याएं अपनी जिंदगी की योजनाएं मुझसे नहीं बाटी। इसे क्या समझू । हो सकता है कि आपने जो कहा था कि मैं जीवेश में पितृवत की प्रति छाया देखती हूं। तो हो सकता है कि मैं आप मे भी पितृवत की छाया देखती हूं। पर मैं आपको पिता नहीं समझती। मैं चाहती हूं कि मैं आपसे हर अच्छी बुरी बात सांझा करूं और आप मेरे से हर बात सांझा करो। ऐसे रिश्ते को आप जो भी नाम देना चाहते हो दे सकते हो।" इतना कहते-कहते निशा की आंखों में आंसू आने लगे। अपूर्व ने निशा के हाथ पर अपना हाथ रख कर बोला "आगे से हमेशा ध्यान रखूंगा।"
At that moment a waiter came and took their orders. Then Nisha said "How is Sandhi. After her father's death she may be feeling alone." Apoorv said "That's why I took leave and went to join her in business. But soon she was upset with my style of working. She appointed a her type of General Manager and I became unwanted person there. That was not tolerable to me. We are so apart from each other in our married life that we have nothing to share between us. We even do not want to be angry with each other. Now we are giving priorities to our Individualness. Nisha asked "Was Sandhi behaving like that from the beginning." Apoorv said "Keep it for some other day. I will tell you in details. It will be so time consuming." Then they started discussing other issues. After some time they came out from restaurant and took auto for their home separately. But now they started meeting frequently.
तभी बेटर आया और उनका आर्डर लेकर चला गया। अब निशा ने चुप्पी तोड़ी और पूछा "संधि का क्या हाल है। अपने पिता की मृत्यु के बाद तो वह काफी अकेली पड़ गई होगी।" अपूर्व ने जवाब दिया "उसकी सहायता के लिए ही तो मैं छुट्टी लेकर गया था। मगर कुछ ही दिनों में मेरा कार्य करने का तरीका संधि को चुभने लगा। अब उसने अपनी तरह की सोच वाले व्यक्ति को एक जनरल मैनेजर रख लिया है। मैं फालतू आदमी हो गया था जो मुझे गवारा नहीं। शादीशुदा जिंदगी में तो हम पहले ही गैर हो चुके। अब एक दूसरे के लिए सांझापन महसूस करने की बजाय हम अपनी निजता को ज्यादा अहमियत देने लगे हैं। इसलिए अब तो आपस में लड़ने का अधिकार भी नहीं समझते।" निशा ने पूछा "क्या सन्धि मैडम शुरू से ही ऐसी हैं।" अपूर्व बोला "अगर बात छेड़ी तो बहुत लंबी जाएगी। आज जाने दो फिर किस दिन इस विषय पर लंबी बात करेंगे।" और फिर उन्होंने बाकी बातें करनी शुरू कर दी। थोड़ी देर में उठे और घर की तरफ का अपना अपना ऑटो पकड़ा और चले गए। मगर अब अपूर्व और निशा जल्दी जल्दी मिलने लगे।
The elections in four states where State Governments were dismissed after demolition of Babri Masjid were due. BJP was having big hopes that they would get benefits of Babri Masjid Demolition but in fact people appreciate BJP efforts for Shree Ram Temple but when they went to vote then casts, economic issues or other political issues dominates. Otherwise also the line of thought that with this demolition the issue had ended for ever was seemed to be getting true and people's attention was turned towards others issues. When the results were declared it was a big shock for BJP. Out of 4 states BJP was defeated in 3 states. The biggest shock was UP. BJP was stunned.
बाबरी मस्जिद की विध्वंस के बाद बर्खास्त की गई चार सरकारो के राज्य में चुनाव नवंबर में होने वाले थे। भाजपा को लग रहा था की श्री राम जन्म भूमि के बदले उन्हें समर्थन मिलेगा। मगर लोग श्री राम मंदिर के मुद्दे पर तो भाजपा का समर्थन करते हैं, मगर वोट डालते हुए फिर जातिवादी के मुद्दे अहम हो जाते हैं, आर्थिक मुद्दे अहम हो जाते हैं, और भी राजनीतिक मुद्दे अहम हो जाते हैं। वैसे भी बाबरी मस्जिद विध्वंस के कुछ समय बाद लोगों का ध्यान अन्य मुद्दों पर चला गया था। और श्री पी वी नरसिम्हा राव की सोच की यह मुद्दा गौण हो जाएगा वह ठीक होती नजर आ रही थी। चुनाव हुए और भाजपा को 4 में से 3 राज्यों में हार का सामना करना पडा। सबसे बड़ा झटका तो उत्तर प्रदेश में श्री कल्याण सिंह सरकार की हार से लगा। भाजपा सदमे में थी
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Sandhi and Apoorv were getting apart. In the evening after coming back home, Sandhi used to start completing her office work and Apoorv in the mean time just to sleep used to go to Shandily room. Slowly in process Shandily's room became the permanent room of Apoorv. So Sandhi and Apoorv started sleeping in different rooms. The Globalization was spreading its feet in the Indian Economy and it's by product 'Corruption' was also started getting it's ways in Indian Economy. Though corruption is a phenomenon which was started when the mankind started doing the business. In Independent India the first case of corruption in Parliament was raised by Mr. Feroz Gandhi in 1958. That was of purchase of shares of Mundra ports by LIC. Mr. Feroz Gandhi was the husband of Mrs Indira Gandhi and father of Mr. Rajiv Gandhi. He raised the issue against our own Government. Ultimately Finance Minister of that time Mr. T. T. Krishnamachari was forced to resigned. But now the Government which was accused of giving bribes to get support was running normally. Corruption was increasing and by continues propaganda Government was trying to convince people that corruption is a part of life. In 1995 Mr. Atal Bihari Bajpayi persued Mr. Shailender Mehto of Jharkhand Mukti Morcha to confess in Parliament that Rs. 50 lacs were given to each M.P of Jharkhand Mukti Morcha who had voted in favour of Government. Discussion took place in Parliament and case was referred to CBI and that was enough. Mr. P. V. Narsimha Rao did not say anything in Parliament. This was a turning point in Indian Parliamentary history when the corruption entered in to the Parliament.
Some new developments took place. Delhi Mero Corporation was constituted. Internet officially entered India. WTO entered in country's economy. Now India started moving further towards Capitalism.
अपूर्व और संधि एक दूसरे से दूर होते जा रहे थे। रात को आकर संधि अपने बेडरूम में ऑफिस का काम लेकर बैठ जाती थी। आहिस्ता आहिस्ता अपूर्व बेडरूम से निकलकर शांडिल्य वाले बेडरूम में चला गया जो कि उसके हॉस्टल जाने से खाली हो गया था। इसी तरह समय गुजरता गया और उदारीकरण भी आगे बढ़ता गया। उदारीकरण का बायप्रोडक्ट भ्रष्टाचार भी ज्यादा बढ़ता गया। वैसे तो भ्रष्टाचार शुरू से ही था। भारत के स्वतंत्र इतिहास में भ्रष्टाचार की पहली घटना सन 1958 में हुई थी। जब एलआईसी के मुंदड़ा पोर्ट के शेयर खरीदने का मामला स्वर्गीय श्री फिरोज गांधी जो श्रीमती इंदिरा गांधी के पति और श्री राजीव गांधी के पिता थे उन्होंने उन्होंने यह मुद्दा पार्लियामेंट में उठाया था। स्वर्गीय श्री फिरोज गांधी ने अपनी ही पार्टी की सरकार को संसद में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरा और तत्कालीन वित्त मंत्री श्री टी टी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। और अब पैसा देकर सांसदों का वोट लेकर बहुमत हासिल करने की आरोपी सरकार सरेआम चल रही थी। भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा था। और साथ-साथ भ्रष्टाचार की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए जनता के दिमाग में यह आहिस्ता आहिस्ता बिठाया जा रहा था कि भ्रष्टाचार तो जीवन का हिस्सा है। 1995 में श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने संसद में झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसद शैलेंद्र महतो से संसद में कहलवाया कि उन्हें और झारखंड मुक्ति मोर्चा के अन्य तीन सांसदों को 50- 50 लाख रुपए दिए गए थे। बहस हुई और केस सीबीआई को दे दिया गया। बस हो गया। श्री पी वी नरसिम्हा राव चुपचाप रहे। संसद में खेद भी प्रकट नहीं किया l यह भारतीय राजनीति का एक ऐसा मोड़ था जहां भ्रष्टाचार सामने था मगर भ्रष्टाचारी मुस्कुरा रहे थे। 5 मार्च 1995 को दिल्ली मेट्रो कंपनी की स्थापना हुई l सरकारी तौर पर इंटरनेट भारत में आ गया । सरकार ने डब्ल्यूटीओ का दामन थाम लिया था ।भारत पूरी तरह पूंजीवादी व्यवस्था की तरफ बढ़ रहा था।
1995 का अंत आते-आते पुरुलिया हथियार कांड हो गया। 17 दिसंबर 1995 को रात को एक विदेशी विमान ने पुरुलिया पश्चिम बंगाल में खेतों में पैराशूट के द्वारा हथियारों के बक्से गिरा दिये। 18 दिसंबर को सुबह जब लोग अपने खेतों की तरफ जाते हैं तो वह बक्से मिलते हैं। उनमे 300 राइफल एके-47 और 156 मिलती हैं। 15 गोलियां, बम और रॉकेट लांचर भी मिलते है । पुलिस को पता चलता है तो वह लोगों से हथियार वापस निकलवा लेती है। 21 दिसंबर 1995 को एक विमान थाईलैंड से करांची जा रहा था। उसे मुंबई हवाई अड्डे पर उतार लिया जाता है। उसमें से किम डेवी, पीटर प्लीज और उनके अन्य साथी यात्रा करते पाए गए। मगर मुख्य अभिय
किम डेवी रहस्यमय तरीके से एयरपोर्ट से निकल भागा। बड़ी हैरानी की बात थी कि एक विदेशी विमान भारतीय क्षेत्र में घुसता है हथियार डालता है चला जाता है। फिर कैसे कोई अभियुक्त हवाई अड्डे जैसी जगह से फरार कैसे हो जाता है। अफवाह तो यह थी कि पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार को गिराने के लिए यह हथियार इस्तेमाल होने थे। जिसके लिए आनंद मार्ग नामक संस्था पर भी उंगली उठाई गयी।
Apoorv was feeling alone in life at that time. He was disillusioned from Union also. Though he was meeting Nisha occasionally but he and Sandhi were becoming stranger in spite of the fact that they were living under the same roof. Influenced by western culture first our joint family converted in to my family of husband, wife and children. But now talking a step ahead now our society was moving towards the thought where individual (me)was important than family. Now Apoorv occassionally started going to Club also. Though he knew none there but still just to pass his evening he started going there.
अपूर्व उस समय बहुत अकेला पड़ता जा रहा था। यूनियन के प्रति भी उसका मन उचाट होता जा रहा था। निशा कभी कबार मिल लेती थी। संधि और वह तो एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबी होते जा रहे थे। पश्चिमी देशों की तरफ बढ़ता यह समाज पहले संयुक्त परिवार की परिभाषा से निकलकर 'मेरा परिवार' तक आ चुका था। अब अब लगता है कि 'एक सिर्फ में 'परिवार की तरफ बढ़ने लगा था। जब ज्यादा अकेलापन महसूस करता तो शाम को कभी कबार क्लब भी जाने लगा था। पहले तो कभी क्लब नहीं जाता था, इसलिए उसको कोई ज्यादा जानता नहीं था। मगर क्योंकि अब तो जाने लगा था और वह भी अकेला तो कुछ लोगों की नजर में आने लगा था। मगर औपचारिक बातचीत शुरू नहीं हुई थी। क्लब में जाकर बस उसको अहसास इतना था कि उसके आसपास कुछ और भी लोग हैं। जो चल फिर रहे हैं। क्योंकि घर में तो संधि अपने काम में व्यस्त रहती थीl शांडिल्य हॉस्टल में थाl बस नौकर ही नजर आता था। संधि तो अक्सर देर से ही आती थी।
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